गुजरात के डांग में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिला तो स्ट्रॉबेरी की खेती बढ़ी, किसान हुए मालामाल


गांधीनगर, 20 मई (आईएएनएस)। डांग जिला गुजरात का सबसे बड़ा स्ट्रॉबेरी उत्पादक क्षेत्र बनकर उभरा है। राज्य की प्राकृतिक खेती की पहल के तहत यहां इसकी खेती लगातार बढ़ रही है और किसान इस फसल से प्रति हेक्टेयर सालाना आठ लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जिले में स्ट्रॉबेरी की खेती का क्षेत्रफल 2022-23 में 20 हेक्टेयर से बढ़कर 2025-26 में लगभग 33 हेक्टेयर हो गया है। इसका उत्पादन जो 2022-23 में 140 मीट्रिक टन था, 2024-25 में बढ़कर 196 मीट्रिक टन हो गया और 2025-26 के दौरान इसके 233 मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है।

राज्य सरकार ने बताया कि यह बढ़ोतरी अनुकूल जलवायु परिस्थितियों, बाजार में बढ़ती मांग और इस आदिवासी जिले में प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाने के कारण हुई है। अधिकारियों ने बताया कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में डांग को देश का पहला प्राकृतिक खेती वाला जिला घोषित किया गया था, जिससे स्थानीय किसानों के बीच रसायन-मुक्त खेती के तरीकों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाने लगा।

अधिकारियों ने कहा कि स्ट्रॉबेरी इस जिले की ठंडी जलवायु और जैविक तत्वों से भरपूर रेतीली और दोमट मिट्टी के लिए बहुत उपयुक्त है। इस फसल के लिए अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी की जरूरत होती है, जिसका पीएच स्तर 5.5 से 7.0 के बीच हो। साथ ही, फूल आने और फल विकसित होने के लिए इसे 8 से 12 घंटे की धूप भी चाहिए होती है। दिन के समय 22 से 25 डिग्री सेल्सियस और रात के समय 7 से 13 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान इसकी खेती के लिए आदर्श माना जाता है। जिले के किसान स्ट्रॉबेरी की नौ किस्मों की खेती कर रहे हैं, जिनमें विंटर डॉन, अर्ली विंटर, कैमारोसा, स्वीट चार्ली, नबीला, नबादी, सेल्वा, बेलरुबी और पजेरो शामिल हैं।

इनमें से, विंटर डॉन सबसे पसंदीदा किस्म बनकर उभरी है, क्योंकि दिसंबर से फरवरी-मार्च के बीच इसकी पैदावार बहुत अच्छी होती है। अहवा तालुका के कई गांवों में बड़े पैमाने पर स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू हो गई है, जिनमें भुरपानी, बोरिगावठा, गालकुंड, कोटमदार, मालेगांव, डाभास, सोनुनियां और वानर शामिल हैं। वाघई तालुका में, कंचनपाड़ा, घोड़वाहाल, मुरंबी और आस-पास के गांवों में खेती का विस्तार हुआ है।

राज्य सरकार के बागवानी विभाग ने प्राकृतिक खेती और खेती के आधुनिक तरीकों को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण शिविर और शैक्षिक दौरे आयोजित किए हैं। किसानों को स्ट्रॉबेरी के पौधों और खेती से जुड़े खर्चों पर 55 से 75 प्रतिशत तक की सब्सिडी भी मिल रही है। मल्चिंग सामग्री, प्लास्टिक कवर, क्रेट, पैकिंग सामग्री, और खेती के उपकरणों जैसे मिनी ट्रैक्टर, रोटावेटर, कल्टीवेटर, और ट्रॉलियों के लिए सहायता प्रदान की जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि कई किसान जो पहले औद्योगिक क्षेत्रों और महाराष्ट्र के खेतों में मजदूरी पर निर्भर थे, अब स्ट्रॉबेरी की खेती की ओर मुड़ गए हैं।

धान, नागली, उड़द और वराई जैसी पारंपरिक फसलों से पहले सीमित आय होती थी लेकिन अब स्ट्रॉबेरी की खेती से किसानों को प्रति हेक्टेयर लगभग सात लाख से आठ लाख रुपये की वार्षिक कमाई हो रही है।

शुरुआत में मुख्य रूप से सापुतारा और आहवा के स्थानीय बाजारों में बेची जाने वाली डांग में उगाई गई स्ट्रॉबेरी अब अहमदाबाद, सूरत और भरूच के बड़े बाजारों में भेजी जा रही है। अधिकारियों ने आगे कहा कि खेती के विस्तार से स्थानीय निवासियों के लिए मौसमी रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं।

–आईएएनएस

डीकेएम/पीएम


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