स्मृति शेष : महंत अवैद्यनाथ ने धर्म को समाजसेवा और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा

नई दिल्ली, 27 मई (आईएएनएस)। भारत के संतों में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो केवल मठ और मंदिर तक ही सीमित नहीं रहे बल्कि वे समय की धारा में एक वैचारिक आंदोलन बने। गोरक्षपीठ के ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ जी महाराज ऐसे ही एक व्यक्तित्व थे। वे गोरखनाथ मठ के पीठाधीश्वर होने के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदू समाज की एकता और लोककल्याण की उस चेतना के वाहक थे, जिसने पूर्वांचल से लेकर पूरे देश के लोगों पर गहरी छाप छोड़ी।
28 मई 1921 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के कांड़ी गांव में जन्मे कृपाल सिंह विष्ट ने जिस यात्रा की शुरुआत हिमालय की गोद से की, वह आगे चलकर हिंदुत्व, सामाजिक समरसता और राष्ट्रचेतना के विराट अभियान में बदल गई।
महंत अवैद्यनाथ उसी गौरवशाली परंपरा के तेजस्वी नक्षत्र थे, जिसकी वैचारिक नींव उनके गुरुदेव महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने रखी थी। दिग्विजयनाथ जी स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कांग्रेस से जुड़े रहते हुए भी हिंदू हितों की रक्षा के लिए मुखर रहे। जब कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप तेज हुए, तब उन्होंने कांग्रेस छोड़कर हिंदू महासभा का दामन थामा और फिर हिंदू समाज के संगठन में जुट गए। सन 1939 में उन्होंने अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा की स्थापना कर साधु-संतों को केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित रहने के बजाय समाज सापेक्ष कार्यों के लिए प्रेरित किया। यही विरासत आगे चलकर महंत अवैद्यनाथ के व्यक्तित्व में और अधिक व्यापक रूप में दिखाई दी।
बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद कृपाल सिंह बिष्ट का झुकाव अध्यात्म की ओर बढ़ा। युवावस्था में उन्होंने हिमालय, कैलाश मानसरोवर, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थों की यात्राएं कीं। 1940 में बंगाल यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात गोरखनाथ मठ के तत्कालीन पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ से हुई। यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। 8 फरवरी 1942 को महज 23 वर्ष की आयु में उन्हें दिग्विजयनाथ ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और उनका नाम ‘अवैद्यनाथ’ रखा। 1969 में जब गुरुदेव दिग्विजयनाथ ब्रह्मलीन हुए तो वह गोरक्षपीठ के पूर्ण पीठाधीश्वर बने।
अवैद्यनाथ का व्यक्तित्व केवल धार्मिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आध्यात्मिकता को समाज सुधार और राष्ट्रहित से जोड़ा। उनका मानना था कि धर्म केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं बल्कि समाज को संगठित और जागृत करने का माध्यम है। हिंदू समाज में व्याप्त छुआछूत और जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए उन्होंने अभियान चलाया। 1980 के दशक में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में हरिजनों के सामूहिक धर्मांतरण की घटना ने उन्हें गहराई से झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने सामाजिक समरसता और हिंदू एकता को अपना प्रमुख लक्ष्य बना लिया। वे कहते थे कि हिंदू समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता है और सबसे बड़ी कमजोरी उसका जातिगत विभाजन।
राजनीति में भी उनका प्रभाव बेहद व्यापक रहा। गोरखनाथ मठ की जिम्मेदारी संभालने से पहले ही वे सक्रिय राजनीति में उतर चुके थे। हिंदू महासभा के टिकट पर वे उत्तर प्रदेश विधानसभा की मानीराम सीट से कई बार विधायक चुने गए। उन्होंने 1962, 1967, 1974 और 1977 में विधानसभा चुनाव जीतकर जनता का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 1970, 1989, 1991 और 1996 में वे गोरखपुर लोकसभा सीट से सांसद बनकर संसद पहुंचे। बाद में उनका जुड़ाव भाजपा से भी हुआ और उनकी राजनीति का मूल आधार हिंदुत्व, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था।
राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका भारतीय राजनीति और हिंदू आंदोलन के इतिहास में विशेष महत्व रखती है। 1984 में वे श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष बने और उन्होंने देशभर के विभिन्न अखाड़ों, संप्रदायों और धर्माचार्यों को एक मंच पर लाने का काम किया। 1990 के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब महंत अवैद्यनाथ आंदोलन के प्रमुख स्तंभ बनकर उभरे। 1990 में कारसेवा के दौरान विवादित ढांचे पर पूजा का आयोजन उनके अडिग संकल्प का प्रतीक माना गया। उनका स्पष्ट कहना था कि राम मंदिर निर्माण तक वे चैन से नहीं बैठेंगे। उन्होंने इस आंदोलन को केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता के संघर्ष के रूप में देखा।
महंत अवैद्यनाथ ने गोरखनाथ मठ को धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बनाने के साथ-साथ उसे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा का बड़ा संस्थान बनाया। वे महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अध्यक्ष रहे और योगवाणी मासिक पत्रिका के संपादक के रूप में वैचारिक लेखन को दिशा दी। पूर्वांचल के गरीब और वंचित वर्गों तक शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने में उनका बड़ा योगदान माना जाता है।
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी बनाना भी उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। 1998 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेते हुए योगी आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। उसी वर्ष योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद चुने गए और उस समय देश के सबसे युवा सांसद बने। उत्तराधिकारी बनाने के साथ-साथ यह गोरक्षपीठ की उस वैचारिक परंपरा का विस्तार था, जिसे दिग्विजयनाथ से अवैद्यनाथ और फिर योगी आदित्यनाथ तक आगे बढ़ाया गया।
12 सितंबर 2014 को गोरखपुर में महंत अवैद्यनाथ का निधन हो गया। नाथ परंपरा के अनुसार उन्हें पद्मासन मुद्रा में समाधि दी गई। हालांकि उनका जीवन आज भी गोरक्षपीठ की परंपरा, हिंदुत्व की वैचारिक धारा और सामाजिक समरसता के अभियानों में जीवंत दिखाई देता है।
–आईएएनएस
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