जापान में बच्चों की आबादी रिकॉर्ड निचले स्तर पर, 45 साल से गिरावट जारी


टोक्यो, 4 मई (आईएए)। जापान में बच्‍चों की आबादी का ग‍िरता स्‍तर च‍िंता का व‍िषय बन हुआ है। स्थानीय मीडिया की सोमवार को जारी र‍िपोर्ट में एक अप्रैल तक के आंकड़ों के अनुसार, जापान में बच्चों की आबादी घटकर अब अनुमानित 13.29 मिलियन रह गई है।

यह पिछले साल की तुलना में 3.5 लाख कम है और अब तक का सबसे निचला स्तर है। यह संख्या लगातार 45वें साल घट रही है।

जापान के इंटरनल अफेयर्स और कम्युनिकेशन मंत्रालय की ओर से जारी डेटा के अनुसार, 15 साल से कम उम्र के बच्चों का कुल आबादी में हिस्सा 0.3 प्रतिशत घटकर 10.8 प्रत‍िशत रह गया है, जो 1950 के बाद सबसे कम है। यह जानकारी जापान के आंतरिक मामलों और संचार मंत्रालय की ओर से जारी की गई।

ये आंकड़े हर पांच साल में होने वाली जनगणना के आधार पर अनुमानित जनसंख्या डेटा से तैयार किए गए हैं, जिसमें विदेशी निवासी भी शामिल होते हैं।

जापानी सरकार की ओर से बच्चे की परवरिश करने वाले परिवारों के लिए फाइनेंशियल मदद बढ़ाने जैसे कई कदम उठाए जाने के बावजूद आबादी में गिरावट 45 वर्षों से जारी है। घटती जन्म दर को ठीक करने के लिए, जापानी सरकार ने 2030 तक के समय को ‘ट्रेंड को बदलने का आखिरी मौका’ घोषित किया है।

आंकड़ों के अनुसार, बच्चों में 6.81 मिलियन लड़के और 6.48 मिलियन लड़कियां हैं। इनमें 12 से 14 साल के बच्चों की संख्या 3.09 मिलियन है, जबकि 0 से 2 साल के छोटे बच्चों की संख्या 2.13 मिलियन है। इससे साफ पता चलता है कि नए जन्मों में लगातार कमी आ रही है।

जापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी शुरुआती डेटा के मुताबिक, 2025 में जापान में कुल 7,05,809 बच्चों का जन्म हुआ, जो अब तक का सबसे कम रिकॉर्ड है और लगातार 10वें साल गिरावट दिखा रहा है।

जापान में बच्चों की आबादी 1954 में अपने चरम पर थी, जब यह 29.89 मिलियन थी। इसके बाद 1982 से इसमें लगातार गिरावट शुरू हो गई।

यह भी बताया गया कि 1975 से अब तक बच्चों की कुल आबादी का अनुपात लगातार 52वें साल घट रहा है।

फरवरी में भी मंत्रालय ने कहा था कि 2025 में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या पिछले साल से कम होकर 7,05,809 रह गई, जो 1899 से अब तक का सबसे कम आंकड़ा है।

यह गिरावट 2.1 प्र‍त‍िशत यानी 15,179 कम जन्मों के बराबर है। जापान इस समय बूढ़ी होती आबादी और बढ़ती महंगाई जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, जिससे बच्चों को पालना और भी महंगा और चुनौतीपूर्ण हो गया है।

–आईएएनएस

एवाई/डीकेपी


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