ग्रेट निकोबार परियोजना हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री उपस्थिति और रणनीतिक पहुंच को मजबूत करेगी


नई दिल्ली, 1 मई (आईएएनएस)। ग्रेट निकोबार परियोजना हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री उपस्थिति और रणनीतिक पहुंच को मजबूत करेगी और ग्रेट निकोबार की महत्वपूर्ण स्थिति का लाभ उठाती है। यह जानकारी सरकार की ओर से जारी एक फैक्टशीट में दी गई।

फैक्टशीट में कहा गया कि ग्रेट निकोबार परियोजना एक सामरिक पहल है, जिसका उद्देश्य अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की उपस्थिति को सशक्त बनाना है। यह परियोजना बंदरगाह-आधारित विकास और सटीक पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के साथ-साथ स्थानीय मूल समुदायों के संरक्षण के बीच एक आदर्श संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है। सामरिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनूठे संगम के माध्यम से, यह परियोजना सुनिश्चित करती है कि ग्रेट निकोबार का विकास न केवल समावेशी और सतत हो, बल्कि राष्ट्रहित के भी पूर्णतः अनुरूप हो।

नोट में कहा गया कि इस परियोजना में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप एवं सुनियोजित नगरीय विकास और पावर प्लांट शामिल है।

सरकार ने बताया कि ग्रेट निकोबार परियोजना को तीन अलग-अलग चरणों में कार्यान्वित किया जा रहा है, जिसमें चरण I (2025–35, 72.12 वर्ग किमी), चरण II (2036–41, 45.27 वर्ग किमी), चरण III (2042–47, 48.71 वर्ग किमी) शामिल हैं।

यह परियोजना कुल 166.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है, जिसमें 35.35 वर्ग किलोमीटर राजस्व भूमि और 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि सम्मिलित है। यह चरणबद्ध दृष्टिकोण न केवल व्यवस्थित बुनियादी ढांचे के विकास को संभव बनाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक चरण में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और जनजातीय कल्याण संबंधी उपायों को प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जाए।

इस परियोजना के सामरिक और आर्थिक महत्व को हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में ग्रेट निकोबार को एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता से बल मिलता है। इस परियोजना में जमीन का सही इस्तेमाल करने और पर्यावरण का पूरा ख्याल रखने पर जोर दिया गया है, ताकि आने वाले समय में इस पूरे इलाके को बड़ा फायदा मिल सके। साथ ही, इस काम में पर्यावरण से जुड़े सभी नियमों (ईआईए) और कानूनी स्वीकृतियों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है।

फैक्टशीट के मुताबिक, ग्रेट निकोबार परियोजना के अंतर्गत पर्यावरणीय संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए अंडमान और निकोबार द्वीपों के कुल वन क्षेत्र का मात्र 1.82 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में लाया जाएगा। चिन्हित क्षेत्र में वृक्षों की अनुमानित संख्या 18.65 लाख है, किंतु सरकार ने इसे न्यूनतम रखने का प्रयास किया है और अधिकतम 7.11 लाख वृक्ष ही काटे जाने की संभावना है, जो 49.86 वर्ग किमी वन क्षेत्र में विस्तृत हैं।

फैक्टशीट में आगे कहा गया कि वृक्षों की यह कटाई एक साथ न होकर, विभिन्न परियोजनाओं के चरणबद्ध विकास के अनुरूप क्रमबद्ध तरीके से की जाएगी। पर्यावरणीय संतुलन सुनिश्चित करने हेतु 65.99 वर्ग किमी क्षेत्र को ‘ग्रीन जोन’ के रूप में संरक्षित रखा जाएगा, जहां एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। चूंकि द्वीपों पर पहले से ही 75 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र उपलब्ध है, अतः नियमों के अनुसार वन क्षेत्र को होने वाली क्षति की भरपाई का कार्य हरियाणा में किया जा रहा है। इसके लिए प्रथम चरण के 48.65 वर्ग किलोमीटर वन डायवर्जन के बदले हरियाणा में 97.30 वर्ग किलोमीटर भूमि को वनीकरण हेतु चिन्हित किया गया है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता दोहराते हुए, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के अंतर्गत अब तक 2.4 मिलियन पौधे रोपे जा चुके हैं।

–आईएएनएस

एबीएस/


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