मुजफ्फरपुर में लीची की तीन नई प्रजातियां विकसित, जून-जुलाई तक मिलेगा स्वाद


मुजफ्फरपुर, 23 मई (आईएएनएस)। लीची के लिए प्रसिद्ध बिहार के मुजफ्फरपुर में ‘शाही’ और ‘चाइना’ लीची के बाद अब तीन नई प्रजातियों की लीची बाजार में आने वाली है। राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र में करीब पांच वर्षों के कड़े शोध के बाद गंडकी संपदा, गंडकी योगिता और गंडकी लालिमा नामक तीन नई किस्में विकसित की गई हैं।

अनुकूल मौसम की वजह से ये नई प्रजातियां जून से लेकर जुलाई के मध्य तक बाजार में उपलब्ध रह सकेंगी। राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के वरीय विज्ञानी डॉ. एसडी पांडेय ने बताया कि शाही लीची का सीजन मई के अंत तक शुरू होकर करीब 15 दिनों तक चलता है। इसके तुरंत बाद लगभग 10 दिनों तक चाइना लीची बाजार में उपलब्ध रहती है। अभी तक किसानों की बागवानी मुख्य रूप से इन्हीं दो प्रजातियों तक सीमित थी, जिसके कारण सीजन जल्दी खत्म हो जाता था, लेकिन नई विकसित तीनों प्रजातियां ‘लेट वेरायटी’ देर से पकने वाली हैं, जो जुलाई मध्य तक बाजार में टिकी रहेंगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे किसानों को लंबे समय तक उत्पादन और बिक्री का सुनहरा अवसर मिलेगा। बताया गया कि तीनों नई प्रजातियां का छिलका शाही और चाइना लीची की तुलना में काफी मोटा होता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि फल जल्दी खराब नहीं होते और परिवहन के दौरान सुरक्षित रहते हैं। जब किसान अपने बागानों में इन प्रजातियों को लगाएंगे, तो वे लंबे समय तक फलों को पेड़ों पर सुरक्षित रख सकेंगे। इनका फलन जून और जुलाई में होता है, इसलिए किसानों को बाजार में बेहतर समय और अच्छे दाम पर बिक्री का मौका मिलेगा।

राहत की बात यह भी है कि इन प्रजातियों की देखभाल के लिए किसी विशेष तकनीक की जरूरत नहीं है; इनका रखरखाव भी शाही और चाइना लीची की तरह ही होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, तीनों किस्मों की अपनी अनूठी विशेषताएं और उत्पादन क्षमता है। गंडकी संपदा का पल्प मलाईदार, सफेद, नरम और रसीला होता है। इसमें फल फटने की समस्या नहीं होती। गंडकी योगिता के पेड़ बौने होते हैं और यह जुलाई के मध्य में पकती है। इसमें सुगंध, मिठास और एसिड का बेहतरीन संतुलन है।

गंडकी लालिमा प्रजाति रांची से लाकर विकसित किया गया है। यह जून के मध्य में तैयार होती है। इसका पल्प बेहद रसीला होता है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य लीची के सीमित सीजन को बढ़ाना और किसानों को अधिक विकल्प देना है। वर्तमान में किसानों को नई प्रजातियों के प्रति जागरूक किया जा रहा है और इसके पौधे उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

–आईएएनएस

एमएनपी/डीएससी


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