केंद्रीय गृह मंत्री पर राहुल गांधी के आरोप निराधार, प्रमाण है तो सामने लाएं: विक्रम सिंह

नोएडा, 5 अगस्त (आईएएनएस)। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा हालिया प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस फायरिंग और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री पर लगाए गए आरोपों पर उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विक्रम सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। राहुल गांधी के आरोपों को पूरी तरह निराधार, बेबुनियाद और अनर्गल बताते हुए उन्होंने कहा कि बल प्रयोग की प्रक्रिया कानून में स्पष्ट रूप से निर्धारित है और उसमें गृह मंत्री की किसी प्रकार की प्रत्यक्ष भूमिका का कोई प्रावधान नहीं है।
समाचार एजेंसी आईएएनएस से खास बातचीत में विक्रम सिंह ने कहा कि राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शन के दौरान हुई फायरिंग और पैलेट गन के इस्तेमाल के निर्देश केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा दिए गए थे, जबकि यह दावा किसी भी कानूनी आधार पर टिकता नहीं है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की संबंधित धाराओं में बल प्रयोग के नियम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं और उनमें कहीं भी गृह मंत्री द्वारा ऐसे निर्देश दिए जाने का उल्लेख नहीं है। सार्वजनिक जीवन में आरोप लगाने से पहले तथ्यों और कानून का अध्ययन करना आवश्यक है, ताकि आरोपों में विश्वसनीयता बनी रहे।
पूर्व डीजीपी ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास इस बात का कोई ठोस प्रमाण है कि गृह मंत्री ने इस प्रकार का कोई आदेश दिया था, तो उसे सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करना चाहिए। यदि कोई लिखित आदेश है तो उसे सामने लाया जाए और यदि कथित निर्देश मौखिक, टेलीफोन या व्हाट्सऐप जैसे किसी माध्यम से दिए गए थे, तो उसका भी प्रमाण उपलब्ध कराया जाए। केवल आरोप लगाने से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता।
बल प्रयोग की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार वरिष्ठ मजिस्ट्रेट या मजिस्ट्रियल अधिकार रखने वाले अधिकारी बल प्रयोग की अनुमति दे सकते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली जैसे पुलिस आयुक्त प्रणाली वाले क्षेत्रों में मजिस्ट्रियल शक्तियों से लैस डीसीपी अथवा सब-इंस्पेक्टर और उससे वरिष्ठ अधिकारी परिस्थितियों के अनुसार बल प्रयोग के निर्देश देने के लिए अधिकृत होते हैं। ऐसे में पुलिस आयुक्त, उपराज्यपाल (एलजी) या गृह मंत्री का नाम इस प्रक्रिया में जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।
विक्रम सिंह ने आगे कहा कि यदि किसी के पास वास्तव में कोई साक्ष्य है तो उसे दिल्ली के मुख्यमंत्री, पुलिस आयुक्त या गृह मंत्रालय को उपलब्ध कराया जा सकता है। किसी भी बल प्रयोग की घटना के बाद उसकी आपराधिक जांच, विभागीय जांच और मजिस्ट्रियल जांच की प्रक्रिया होती है, जिसमें सभी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष विवेचना की जाती है। उन्होंने आगे कहा कि बिना प्रमाण के इस प्रकार के गंभीर आरोप लगाने से न केवल जांच प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि आरोप लगाने वाले का पक्ष भी कमजोर पड़ जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में गंभीर आरोपों के साथ ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है, ताकि तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच हो सके।
–आईएएनएस
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