कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की आईटी नियम संशोधन वापस लेने की मांग, मंत्री अश्विनी वैष्णव को लिखा पत्र

नई दिल्ली, 8 मई (आईएएनएस)। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर प्रस्तावित 3(4) सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों में संशोधन पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए वापस लेने की मांग की है। इसके साथ ही कहा कि कार्यपालिका के संचार के माध्यम से वास्तविक दायित्वों का सृजन होते समय संसद मूक दर्शक नहीं बनी रह सकती है।
चिदंबरम ने लिखा, “मैं यह पत्र संसदीय निगरानी, लोकतांत्रिक जवाबदेही और भारत के डिजिटल शासन ढांचे के भविष्य के गंभीर मुद्दे की ओर आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए लिख रहा हूं। सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(4) में प्रस्तावित संशोधन इन मुद्दों पर गंभीर चिंताएं पैदा करता है। सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम, 2000 के तहत नियम बनाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है, लेकिन ये शक्तियां संवैधानिक सुरक्षा उपायों और संसदीय जांच के अधीन हैं। वर्तमान प्रस्ताव इस ढांचे से काफी आगे जाता प्रतीत होता है, क्योंकि यह मंत्रालय द्वारा जारी सलाह, स्पष्टीकरण, मानक संचालन प्रक्रियाएं, निर्देश और अन्य कार्यकारी उपकरणों को आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत मध्यस्थों के उचित परिश्रम दायित्वों के बाध्यकारी घटक बनने की अनुमति देता है।”
कांग्रेस सांसद ने सरकार पर विधेयक थोपने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “यह एक चिंताजनक मिसाल कायम करता है, क्योंकि सामान्यतः प्रशासनिक या सलाहकारी प्रकृति के उपकरण अब संसद के समक्ष रखे बिना, सार्वजनिक रूप से बहस किए बिना या प्रत्यायोजित विधान पर सामान्यतः लागू होने वाली जांच के अधीन किए बिना कानूनी परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। कार्यपालिका संचार के माध्यम से ठोस दायित्व निर्धारित करते समय संसद को मूक दर्शक नहीं बना सकता। यदि सरकार मध्यस्थों पर नए कर्तव्य थोपना चाहती है, तो उसे स्पष्ट कानून, उचित प्रक्रिया, संसदीय जांच और सार्वजनिक परामर्श के माध्यम से ऐसा करना होगा।”
सांसद ने कहा, “प्रस्तावित नियम के दूरगामी परिणाम केवल प्लेटफार्मों तक ही सीमित नहीं हैं, क्योंकि उचित सावधानी के दायित्व सीधे ऑनलाइन अभिव्यक्ति, सामग्री नियंत्रण, सूचना तक पहुंच, शिकायत निवारण तंत्र, पत्रकारों, रचनाकारों, स्टार्टअप्स, नागरिक समाज संगठनों और आम इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को प्रभावित करते हैं। इसलिए, इन दायित्वों के किसी भी विस्तार पर सावधानी, पारदर्शिता और सार्थक परामर्श के साथ विचार किया जाना चाहिए।”
सांसद ने कहा, “व्यापार करने में आसानी और नियामकीय निश्चितता को लेकर भी चिंताएं हैं। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को स्थिर, पूर्वानुमानित और स्पष्ट रूप से परिभाषित नियामक ढांचे की आवश्यकता है। भविष्य के परामर्शों और मानक परिचालन प्रक्रियाओं के माध्यम से अनिश्चित अनुपालन दायित्व भारत के प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र में कार्यरत व्यवसायों, इनोवेटर्स और निवेशकों के लिए अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं। इसलिए, मैं इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से प्रस्तावित नियम 3(4) को उसके वर्तमान स्वरूप में वापस लेने का आग्रह करता हूं।”
–आईएएनएस
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