जब हौसलों के आगे मुश्किल हालात रोक नहीं पाए कदम, कृत्रिम पैरों से अरुणिमा सिन्हा ने सबसे ऊंची चोटी पर लिखी जीत की इबारत

नई दिल्ली, 19 जुलाई (आईएएनएस)। 11 अप्रैल 2011 की वो रात, जिसने एक होनहार खिलाड़ी की जिंदगी बदल दी। लगभग मौत को छूकर लौटने के बाद इस खिलाड़ी ने हार नहीं मानी और फिर ऐसा इतिहास रच दिया, जिसकी कल्पना कर पाना हर किसी के लिए असंभव है। यह कहानी है भारत की उस दिव्यांग खिलाड़ी की, जिसने बुलंद हौसलों और इरादे के साथ अपने कृत्रिम पैरों से विश्व की सबसे ऊंची चोटी को भी छोटा साबित कर दिया। बात हो रही है माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय दिव्यांग खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा की।
20 जुलाई 1989 को जन्मी अरुणिमा सिन्हा की कहानी सिर्फ एक पर्वतारोही की विजय गाथा नहीं बल्कि दृढ़ निश्चय, साहस और आत्मविश्वास की एक मिसाल है। उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले में पड़ने वाले पंडाटोला में उनका जन्म हुआ। खेलकूद का शौक था, जैसे हर बच्चे में होता है, लेकिन उनके इरादे औरों से कहीं अधिक बुलंद थे। वॉलीबॉल खेल में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा के बल पर पहचान बनाई।
हालांकि, अरुणिमा की जिंदगी में एक बहुत ही दर्दनाक मोड़ तब आया, जब अप्रैल 2011 में वह लखनऊ से दिल्ली की यात्रा कर रही थीं। एक सोने की चेन के लिए कुछ बदमाशों ने उन्हें चलती ट्रेन से फेंक दिया था। वह पूरी रात पटरी पर पड़ी रहीं और 48 ट्रेनें उनके पास से गुजरती रहीं। रेलवे ट्रैक का वह मंजर भी उनके लिए एक डरावने सपने जैसा था। हादसे में दोनों पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके थे।
अरुणिमा सिन्हा ने 2011 की उस घटना के बारे में एक इंटरव्यू में कहा, “यह मेरी जिंदगी का यू-टर्न था। दिल्ली में एक जॉब इंटरव्यू था, इसलिए लखनऊ से ट्रेन के जरिए आ रही थी। कुछ लोगों ने ट्रेन में लूटपाट शुरू की। मैं एक खिलाड़ी थी तो उसी के अनुरूप एक भावना उठी और मैंने अपनी सोने की चेन को बचाने की कोशिश की। हाथापाई हुई और लुटेरों ने चलती ट्रेन से उन्हें नीचे फेंक दिया।”
अरुणिमा सिन्हा ने बताया था, “मैं ट्रैक पर पड़ी रही और ट्रेनें गुजरती रहीं। यहां तक कि ट्रेन जब गुजरती थी तो लोगों का टॉयलेट भी उस समय शरीर पर गिरता था। मैं उठने की कोशिश कर रही थी लेकिन उठ नहीं पा रही थी। एक पैर कट चुका था और दूसरे पैर की हड्डियां टूटकर बाहर आ चुकी थीं।”
हालांकि, अगली सुबह सूरज के उगने के साथ ही इंसानियत भी जागी और गांववालों का एक समूह उनकी मदद के लिए आगे आया। उन्होंने उन्हें पटरी से उठाया और बरेली के जिला अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में इलाज के लिए व्यवस्थाएं नहीं थीं।
अरुणिमा सिन्हा बताती हैं, “मैं डॉक्टरों की आवाज सुन पा रही थी लेकिन उस समय देख नहीं पा रही थी। मैंने बोला कि मैं कई घंटों से रेलवे ट्रैक पर थी, तो आप मेरा पैर काटेंगे तो अच्छे के लिए क्योंकि दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था।”
डॉक्टरों को मजबूरन उनका एक पैर काटना पड़ा। उनकी जगह कृत्रिम पैर लगाया गया। बहुत मुश्किल हालात का सामना करने के बावजूद अरुणिमा सिन्हा ने इस त्रासदी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया और इसके बजाय अपने पर्वतारोहण के सपने को पूरा करने का रास्ता चुना।
वह इस बात में विश्वास रखती हैं कि, “जो आप नहीं कर सकते, उसे उस काम के आड़े न आने दें जो आप कर सकते हैं।”
अरुणिमा के मन में उस एक अनजान रास्ते से एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने का विचार आया। सिर्फ अपने मजबूत इरादे और कभी न हार मानने वाले जज्बे के साथ, वह एक ऐसी यात्रा पर निकल पड़ीं जो उनकी हिम्मत की कड़ी परीक्षा लेने वाली थी। अरुणिमा उत्तरकाशी में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के कैंप में शामिल हुईं, जहां उन्हें माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल ने ट्रेनिंग दी।
तमाम मुश्किलों के बावजूद वह माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचीं और 2013 में यह अद्भुत कारनामा करने वाली पहली दिव्यांग महिला बनीं। 52 दिनों की कड़ी मेहनत, मजबूत इरादे और हिम्मत के बाद वह चोटी पर पहुंचीं। माउंट एवरेस्ट फतह और बाधाओं को पार करने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
–आईएएनएस
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