यादों में वेंकटेश : राजभाषा हिंदी के लिए संविधान सभा में बुलंद हुई थी वेंकटेश नारायण तिवारी की आवाज


नई दिल्ली, 19 जून (आईएएनएस)। कानपुर में जन्मे और प्रयागराज की बौद्धिक आबोहवा में पले-बढ़े वेंकटेश नारायण तिवारी गोपालकृष्ण गोखले की ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ के आजीवन सदस्य थे।

वर्ष 1910 में जब ‘अभ्युदय’ पत्र के संपादक कृष्णकांत मालवीय पर ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया, तो औपनिवेशिक अदालत के भारी दबाव की परवाह न करते हुए वेंकटेश नारायण तिवारी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और श्याम मोहन ने उनके पक्ष में निर्भीक गवाही दी थी। वेंकटेश नारायण तिवारी ने बाद में ‘अभ्युदय’, ‘भारत’ और स्वतंत्रता के बाद 1955 में दिल्ली से प्रकाशित ‘जनसत्ता’ का संपादन कर अपनी प्रखर पत्रकारिता से जनचेतना को जगाए रखा।

वेंकटेश नारायण तिवारी की संवेदनशीलता की जड़ें भारत के गांवों और सुदूर देशों में बसे भारतीय मजदूरों तक फैली थीं। लखनऊ कांग्रेस के निर्देश पर उत्तर प्रदेश के किसानों की बदहाली का अध्ययन करने के लिए एक ‘किसान जांच समिति’ बनी। वेंकटेश नारायण तिवारी इसके अध्यक्ष थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री इसके सचिव थे। वर्ष 1937 में आई इनकी ऐतिहासिक रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन की नींव रखी।

इन्हें भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की स्थिति जांचने के लिए बने ‘पिल्लई आयोग’ का सदस्य सचिव बनाकर गुयाना भेजा गया। वर्ष 1939 में जब राजनीतिक समझौतों के तहत हिंदी के स्थान पर कृत्रिम ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा को थोपने का प्रयास शुरू हुआ, तो वेंकटेश नारायण तिवारी ने इसका पुरजोर विरोध किया। उन्होंने इस वैचारिक लड़ाई को केवल जज्बातों से नहीं बल्कि वैज्ञानिक सांख्यिकी से लड़ा। उनकी पुस्तक ‘हिन्दी बनाम उर्दू’ (1939) ने 1891 से 1936 तक के सरकारी आंकड़ों से यह साबित किया कि समाज स्वाभाविक रूप से देवनागरी लिपि और उच्च हिंदी की ओर बढ़ रहा है।

वर्ष 1946 में वेंकटेश नारायण तिवारी संयुक्त प्रांत से संविधान सभा के सदस्य चुने गए। देश के संघीय ढांचे को मजबूत करने और 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित करवाने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही।

20 जून 1964 को वे इस दुनिया को छोड़ चले। स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1951-1952 के पहले आम चुनाव में कानपुर-फर्रुखाबाद सीट से देश के पहले लोकसभा सदस्य चुने जाने वाले पंडित वेंकटेश नारायण तिवारी का कानपुर स्थित निवास ‘हरिहर नाथ भवन’ आज भी भारत के स्वर्णिम इतिहास का मूक गवाह है।

–आईएएनएस

वीकेयू/पीएम


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