इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आरोपी पति को दी गई जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की, आत्मसमर्पण का दिया आदेश


नई दिल्ली, 6 मई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के दहेज हत्या मामले में आरोपी एक व्यक्ति को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत रद्द कर दी है। इस राहत को “कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं” बताते हुए अदालतों को महिलाओं के खिलाफ अपराधों को “बहुत हल्के में” लेने के खिलाफ चेतावनी दी है।

न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मृतक महिला के पिता द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए आरोपी पति को एक सप्ताह के भीतर जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया, अन्यथा दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

यह मामला एक महिला की मौत से संबंधित है, जो फरवरी 2019 में हुई अपनी शादी के सात साल के भीतर 11 जुलाई, 2024 को गाजियाबाद स्थित अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थी।

मृतका के पिता द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि शादी के समय 30 लाख रुपये से अधिक खर्च करने के बावजूद, पति और उसके परिवार ने एक एसयूवी और दहेज के रूप में अतिरिक्त 10 लाख रुपये की मांग जारी रखी।

शिकायत के अनुसार, दहेज की मांग को लेकर महिला को शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का शिकार बनाया गया, उसके साथ मारपीट की गई, गाली-गलौज की गई और उसे जान से मारने की धमकी दी गई।

एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले मृतका ने फोन पर अपने पिता को बताया था कि ससुरालवाले उसके साथ मारपीट कर रहे थे और उसे जान से मारने की धमकी दे रहे थे।

इस मामले की जांच के परिणामस्वरूप पति और उसके माता-पिता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के विभिन्न प्रावधानों के तहत आरोप पत्र दायर किया गया।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अगस्त 2025 में आरोपी पति को जमानत दे दी थी, जिसमें मृत्यु का कारण “मृत्यु से पहले फांसी के परिणामस्वरूप दम घुटना” बताया गया था और एफआईआर दर्ज करने में कथित देरी का हवाला दिया गया था।

जमानत आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इतने गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में विवेक का प्रयोग करते हुए घोर त्रुटि की है।

न्यायमूर्ति परदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जमानत के लिए अर्जी दाखिल करते समय, उच्च न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह अपराध की प्रकृति और प्रथमदृष्टया मामले पर विचार करे। एफआईआर में पिता द्वारा लगाए गए आरोप प्रथमदृष्टया मामले से कहीं अधिक सबूत पेश करते हैं।

इसमें आगे कहा गया है कि मृतका की मृत्यु विवाह के सात साल के भीतर उसके ससुराल में हुई थी और दहेज उत्पीड़न के गंभीर आरोप थे, जो भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 118 के तहत वैधानिक अनुमान को आकर्षित करते हैं।

दहेज हत्याओं में वृद्धि पर चिंता व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि दहेज की मांग को लेकर युवा विवाहित महिलाओं को ससुराल में बेरहमी से मार डाला जा रहा है। न्यायमूर्ति परदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “एक युवती का विवाह दहेज की मांग को लेकर ससुराल में बेरहमी से मारे जाने के लिए नहीं होता। यह देश के कुछ राज्यों में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में एक गंभीर समस्या है।”

उन्होंने कहा कि शैक्षिक प्रगति और महिलाओं को सशक्त बनाने के प्रयासों के बावजूद विवाह के बाद दहेज की मांग के कारण उन्हें लगातार उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है।

–आईएएनएस

एसएके/पीएम


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