'टेक्नोलॉजी लॉ' पुस्तक लोकार्पण पर अर्जुन राम मेघवाल बोले, एआई इंसानों की जगह नहीं ले सकता


नई दिल्ली, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। “इनोवेशन, टेक्नोलॉजी या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किसी इंसान की जगह नहीं ले सकते। एआई कई चुनौतियां पेश करता है, और हम तकनीकी रूप से अत्यधिक उन्नत हो चुके हैं, लेकिन यह किसी व्यक्ति की जगह नहीं ले सकता,” केंद्र सरकार के कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने प्रौद्योगिकी कानून: विनियम, साइबर नीति और डिजिटल परिदृश्य पुस्तक के लोकार्पण अवसर पर कहा। यह पुस्तक रॉडनी डी. राइडर और निखिल नरेन द्वारा लिखी गई है।

उन्होंने कहा, “भाप इंजन के समय से ही लोग नए विकासों को लेकर सशंकित रहे हैं। इससे बदलाव आया और व्यापार में वृद्धि हुई। जैसे-जैसे तकनीक आगे बढ़ती है, हम दुनिया के परिवर्तनों के अनुसार खुद को ढालते हैं। इसी तरह हम अब एआई और रोबोटिक्स के युग में हैं, लेकिन यह नए अवसर भी लेकर आएगा। जो बदलेगा वह नौकरियों और अवसरों का स्वरूप होगा, और विशेषज्ञों को उन्हें विकसित करना होगा। कानूनी क्षेत्र में भी तकनीकी हस्तक्षेप बढ़ रहा है। हम अब इंडस्ट्री 4.0 के दौर में हैं। हमें इन नई चुनौतियों को स्वीकार करना होगा और समझना होगा कि ये राष्ट्र के हित में कैसे उपयोगी हो सकती हैं। प्रौद्योगिकी कानून: विनियम, साइबर नीति और डिजिटल परिदृश्य पुस्तक हमें यह समझने में मदद करेगी कि उभरते तकनीकी अवसरों का सर्वोत्तम उपयोग कैसे किया जाए।”

यह पुस्तक प्रौद्योगिकी कानून: विनियम, साइबर नीति और डिजिटल परिदृश्य पाठकों को उनके अधिकारों, जोखिमों और कानून एवं तकनीक के संगम को आत्मविश्वास के साथ समझने और उसमें आगे बढ़ने का मार्ग बताती है।

नीतिगत और कानूनी दृष्टिकोणों से भरपूर यह पुस्तक, जो सामान्यतः कई विशेषज्ञ ग्रंथों में बिखरे हुए मिलते हैं, छात्र-हितैषी मूल्य पर उपलब्ध है, जिससे यह तकनीकी कानून पर सबसे व्यापक और किफायती पुस्तकों में से एक बनती है। इसमें भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (और नियम), डेटा संरक्षण, निगरानी, ऑनलाइन ब्रांड प्रबंधन से लेकर नई तकनीकों तक तकनीकी कानून का पूरा दायरा शामिल है।

यह पुस्तक पेशेवरों के पुस्तकालयों के लिए स्वागतयोग्य योगदान होगी और विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम का एक आवश्यक हिस्सा बनेगी।

अपने स्वागत भाषण में ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति प्रो. (डॉ.) सी. राज कुमार ने कहा, “मैं प्रोफेसर निखिल नरेन और सह-लेखक रॉडनी राइडर को बधाई देता हूं, जिन्होंने तकनीकी कानून के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐसे समय में जब एआई की भूमिका और उसके भविष्य पर प्रभाव को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है, इस प्रकार का अकादमिक कार्य हमें स्पष्टता, संगति और बेहतर समझ देगा कि एआई कानून और न्याय के भविष्य को किस प्रकार प्रभावित करेगा। नवाचार और तकनीक से जुड़ा ज्ञान समाज, तथा कानून और न्याय की भूमिका जो हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करती है, वही हमें विकसित भारत के लक्ष्य तक पहुंचाएगी।”

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और भारत सरकार के पूर्व जी20 शेरपा अमिताभ कांत थे।

भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा, “तकनीक और विज्ञान-प्रधान दुनिया में भविष्य कैसा होगा, इस पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। कभी यह डरावना लगता है, कभी बेहद अद्भुत। लेकिन हम यह नहीं जानते कि हम इसमें कैसे आगे बढ़ेंगे। हमारे मस्तिष्क को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलावा किसी अन्य विनियमन के अधीन नहीं किया जा सकता। हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हमारे मन का प्रभाव बना रहे; और हमारे मन हमेशा यथासंभव स्वतंत्र रहें ताकि वे कानून की मूलभूत अवधारणाओं, उसकी सीमाओं, उसके अनुप्रयोग और प्रभाव को परिभाषित कर सकें। मेरा मानना है कि प्रश्न प्रभावों के प्रभाव से निपटने का है। जीवन का कोई भी हिस्सा कानून और विनियमन से मुक्त नहीं है।”

भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “भारत तेज गति से प्रगति कर रहा है और डिजिटल इंडिया में हम समय से आगे हैं। जब मैं डिजिटल कानून की बात करता हूं, तो मेरा आशय भारत और अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था के बीच के संगम से है। डिजिटल माध्यम के संदर्भ में दुनिया एक इकाई है। यहां कोई राष्ट्रीय सीमाएं नहीं हैं। कोई भौतिक सीमाएं नहीं हैं। कठिनाई यह है कि जब मैं कुछ करता हूं, तो मैं अपने संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर करता हूं, जो मेरी स्वतंत्रताओं को परिभाषित करता है और उनकी सीमाएं भी तय करता है। ऐसी ही स्वतंत्रताएं या सीमाएं अन्य देशों में नहीं मिलतीं। दूसरी चुनौती आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। मेरी दृष्टि में अब तक एआई वैधानिक रूप से अनियमित रहा है। मुझे कोई व्यापक विधायी ढांचा नहीं दिखता जो एआई को नियंत्रित, विनियमित या परिभाषित करता हो। एआई ने हमारे सामने कई ऐसी चुनौतियां रखी हैं, जिनकी मानव जाति ने कभी कल्पना नहीं की थी। इसलिए हमें ऐसे पेशेवरों की जरूरत है जो डिजिटल माध्यम के तकनीकी और कानूनी दोनों पहलुओं को समझते हों और वैश्विक स्तर पर लागू होने वाला समग्र ढांचा विकसित कर सकें। यदि हम तकनीक को डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में विकसित करें, उसे इंटरऑपरेबल, ओपन और सुरक्षित रखें, तो हम जनसंख्या स्तर पर परिवर्तन ला सकते हैं।”

भारत सरकार के पूर्व जी20 शेरपा अमिताभ कांत ने कहा, “यह पुस्तक कई मायनों में उल्लेखनीय है, क्योंकि मैं हमेशा मानता रहा हूं कि भारत का डिजिटल परिवर्तन आज दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण विकास कहानियों में से एक है। हमारे पास 1.5 अरब डिजिटल पहचानें हैं, लेकिन 2015 से 2017 के बीच हमने 55 करोड़ बैंक खाते खोले; भारत में हर सेकंड एक बैंक खाता खोला गया। फिर हमने उन्हें आधार और मोबाइल नंबरों से जोड़ा। इससे तेज भुगतान संभव हुआ और फिर कई स्टार्टअप्स ने क्रेडिट, शेयर बाजार, टैक्स सेवाएं शहरों में और बीमा सेवाएं ग्रामीण क्षेत्रों में देना शुरू किया। अदालतें उन मामलों के लिए होनी चाहिए जिनमें वास्तव में न्यायिक निर्णय की जरूरत हो, न कि हर सामान्य विवाद का पहला ठिकाना। न्यायालय तकनीक को केवल बैक-ऑफिस कंप्यूटरीकरण नहीं माना जाना चाहिए। यह वैकल्पिक विवाद समाधान तक फैला हुआ एक संपूर्ण ऑपरेटिंग सिस्टम होना चाहिए।”

पुस्तक के सह-लेखक और स्क्रिबोर्ड के संस्थापक एवं वरिष्ठ भागीदार रॉडनी डी. राइडर ने कहा, “यह उन उपलब्धियों का ऐतिहासिक दस्तावेज है, जिन्हें हमने एक राष्ट्र के रूप में तकनीकी कानून के माध्यम से हासिल किया है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम का विकास लगातार 25 वर्षों की नीतिगत प्रक्रिया का शानदार उदाहरण है, जिसे लगातार सरकारों ने गति और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ाया। यह पुस्तक उसका सार है और अकादमिक जगत के लिए एक संसाधन भी है।”

जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के सहायक प्रोफेसर, सिरिल श्रॉफ सेंटर फॉर एआई, लॉ एंड रेगुलेशन के सहायक निदेशक तथा पुस्तक के सह-लेखक प्रो. निखिल नरेन ने कहा, “हम किसी भी समय अपोलिटिकल नहीं रह सकते। नीति और राजनीति हमेशा हम तक पहुंचती है, जैसे तकनीक पहुंची है। इसलिए जब तकनीक और नीति पर कुछ लिखने की बात आती है, तो यह उसके गतिशील स्वभाव के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि कानून इतना कल्पनाशील होना चाहिए कि नवाचार को सक्षम करे, लेकिन इतना कठोर भी कि अधिकारों, गरिमा और लोकतांत्रिक संस्थानों की रक्षा कर सके।”

प्रो. नरेन ने कुछ नए विचारों का भी उल्लेख किया, जिन्हें वे इस पाठ में शामिल देखना चाहते थे, जैसे “सोशल मीडिया पैरानॉइया” की अवधारणा, एक ऐसी स्थिति जिसमें दृश्यता, मान्यता, ट्रोलिंग, वायरलिटी और लगातार तुलना यह तय करती है कि व्यक्ति कैसे सोचता है, व्यवहार करता है और स्वीकृति चाहता है।

पुस्तक यह भी तर्क देती है कि डिजिटल युग की शब्दावली को भी विकसित होना चाहिए: “इन्फ्लुएंसर” शब्द सामाजिक प्रभाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और उसके पीछे की अटेंशन इकोनॉमी को छिपाता है, जबकि “क्लिकस्टार” उन इंटरनेट हस्तियों के लिए अधिक सटीक शब्द है जिनकी पहचान क्लिक, पहुंच, एंगेजमेंट और एल्गोरिद्मिक दृश्यता पर आधारित होती है, न कि वास्तविक प्रभाव पर।

प्रो. (डॉ.) दीपिका जैन, एग्जीक्यूटिव डीन, जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल ने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल का परिचय दिया। प्रो. (डॉ.) एस.जी. श्रीजीत, डीन, स्ट्रैटेजी एंड इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग, ऑफिस ऑफ द वाइस चांसलर, ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी ने समालोचनात्मक प्रशंसा प्रस्तुत की और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. पावनी जैन, सहायक निदेशक, सिरिल श्रॉफ सेंटर फॉर एआई, लॉ एंड रेगुलेशन ने दिया।

–आईएएनएस

डीएससी


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