जलवायु परिवर्तन से निपटने में बाधा बन रहे AI और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म

जेनेरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के साथ लार्ज लैंग्वेज मॉडल जैसे OpenAI का ChatGPT, और सोशल मीडिया से जलवायु परिवर्तन के लिए उठाए जा रहे कदम प्रभावित हो सकते हैं। यह दावा ग्लोबल इन्वायरमेंटल पॉलिटिक्स जर्नल में छपे एक आर्टिकल में किया गया है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया (यूबीसी) के शोधकर्ताओं ने बताया, यह आम धारणा है कि जलवायु परिवर्तन के लिए उठाए जा रहे कदमों को लेकर एआई, सोशल मीडिया और दूसरे टेक प्रोडक्ट और प्लेटफॉर्म इसे लेकर न्यट्रल हैं या वे कुछ हद तक सकारात्मक हैं।

गंभीर मुद्दों से भटका रहे ध्यान

शोधकर्ताओं का दावा है कि ये उन सभी रचनात्मक सोच और समस्या-समाधान के लिए मानवीय क्षमताओं को कम कर सकते हैं – जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही ये प्लेटफॉर्म गंभीर वैश्विक मुद्दों की अहमियत कम कर रहे हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया में प्रोफेसर डॉ. हामिश वान डेर वेन के अनुसार, “ये टेक्नोलॉजी मानवीय व्यवहार और सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित कर रही हैं, जलवायु परिवर्तन के प्रति दृष्टिकोण और प्रतिक्रियाओं को भी आकार दे रही हैं।” वे आगे बताते हैं कि एआई और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड बदलता रहता है, जिससे वे जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दे पर भी बात सभी ध्यान भटकता रहता है।

कम हो रही रचनात्मकता

जेनेरेटिव एआई की समीक्षा करते हुए वे आगे कहते हैं कि सोशल मीडिया पर बार-बार नकारात्मक खबरों को चलते लोगों में आशा कम होने लगती है और निराशा की भावना बढ़ सकती है। यह हमें जलवायु परिवर्तन पर संगठित होने से भी रोकता है। डॉ वैन डेर वेन आगे करते हैं कि टेक्नोलॉजी पर बढ़ती निर्भरता से रचनात्मक और सोचने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है।

शोध में बताया गया है कि सोशल मीडिया और एआई में अक्सर गलत या पक्षपातपूर्ण जानकारी मिलती है, जो जलवायु परिवर्तन के लिए उठाए जाने वालें कामों को बाधित कर सकता है।

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