ब्रिटिश पार्लियामेंट में आचार्य प्रशांत का उद्घोष: भारत की वास्तविक पहचान संस्कृति या व्यंजन नहीं, आत्मज्ञान है

लंदन, 14 जून (आईएएनएस)। दार्शनिक व लेखक आचार्य प्रशांत ने 12 जून को ब्रिटिश पार्लियामेंट के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम को संबोधित किया। ‘इंडियन रूट्स, ग्लोबल विंग्स’ विषय पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए उन्होंने भारतीय दर्शन और वेदांत के संदेश को वैश्विक संदर्भ में रखा।
उन्होंने कहा कि सच्ची भारतीयता संस्कृति, परंपराओं, उत्सवों या खान-पान से परे है। उन्होंने कहा की भारत की असली पहचान आत्मज्ञान पर उसके बल में निहित है-आत्मज्ञान जो इस मूल प्रश्न के प्रति जिज्ञासा से उत्पन्न होता है- ‘कोहम्?’ अर्थात ‘मैं कौन हूं?’
आचार्य प्रशांत ने ब्रिटिश संसद के आसन वेस्टमिंस्टर पैलेस में अपना संबोधन दिया, जो दशकों से विश्व की गिनी-चुनी सबसे प्रतिष्ठित हस्तियों के ऐतिहासिक भाषणों का साक्षी रहा है। इनमें क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय, पोप बेनेडिक्ट 16वें, नेल्सन मंडेला, रोनाल्ड रीगन, बिल क्लिंटन, बराक ओबामा और जनरल चार्ल्स द गॉल जैसे प्रख्यात नाम सम्मिलित हैं।
कार्यक्रम में ब्रिटेन के नीति-निर्माता, सांसद, शिक्षक, विद्यार्थी और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। गणमान्य व्यक्तियों में लॉर्ड बिलिमोरिया (करण बिलिमोरिया, बैरन बिलिमोरिया ऑफ चेल्सी), क्रॉसबेंच पीयर और 2014 से 2024 तक बर्मिंघम विश्वविद्यालय के चांसलर; लॉर्ड नागराजू (बैरन नागराजू ऑफ ब्लूम्सबरी), लेबर लाइफ पीयर और एआई पॉलिसी लैब्स और महात्मा गांधी फ्यूचर लीडर्स प्रोग्राम के संस्थापक; ब्रेंट वेस्ट से लेबर सांसद बैरी गार्डिनर; भारत के डिप्टी हाई कमिश्नर कार्तिक पांडे; और आईएनएसए के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित तिवारी सम्मिलित थे। इस गरिमामय आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में आचार्य प्रशांत ने श्रोताओं को उपनिषद के श्लोक ‘असतो मा सद्गमय’ की समकालीन और वैश्विक प्रासंगिकता से आलोकित किया।
आचार्य प्रशांत ने कहा कि भारतीय जड़ें केवल सांस्कृतिक पहचान का विषय नहीं हैं, बल्कि स्वयं को जानने और समझने की गंभीर प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि वेदांत, बुद्ध, संत कबीर और भारत की अन्य महत्वपूर्ण दार्शनिक धाराएँ इसी ईमानदार आत्म-अन्वेषण से उद्भूत हुई हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक विस्तार और सफलता को अक्सर स्वतंत्रता समझ लिया जाता है, जबकि वास्तविक स्वतंत्रता बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि भीतर की बंधनों को पहचानकर उनसे मुक्त होने से आती है।
उपनिषदों की प्रार्थना ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय’ का उच्चारण करते हुए आचार्य प्रशांत ने उसका विस्तृत विवेचन किया। उन्होंने कहा कि यह कोई धार्मिक या संप्रदायगत अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए आंतरिक यात्रा का आह्वान है- असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृतत्व की ओर बढ़ने का आह्वान।
इसी क्रम में उन्होंने कठोपनिषद् के संदेश ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ – उठो, जागो, और ज्ञानियों से सीखो, और नकार की विधि ‘नेति नेति’- ना यह, ना यह, का भी उल्लेख किया। वैदिक उद्घोष ‘चरैवेति, चरैवेति’ का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि साधक को किसी भी बाहरी पहचान, उपलब्धि या प्रतीक पर ठहर नहीं जाना चाहिए। ये पहचानें अहंकार को आश्रय देती हैं और आत्म-जिज्ञासा इन सब को नकारकर आगे बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि भारत का वास्तविक संदेश भीतर के विसर्जन से उत्पन्न बाहरी विस्तार का है।
संसद परिसर के बाहर आईएएनएस से बातचीत करते हुए आचार्य प्रशांत ने जलवायु संकट का रूख किया। उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए, जलवायु संकट मनुष्य की आंतरिक व्यवस्था की समस्या है, और विधायकों को इसे स्वीकार करना होगा। यह उत्सर्जन की समस्या नहीं है। यह चेतना की समस्या है। जलवायु परिवर्तन, सामाजिक विखंडन और मानसिक अशांति जैसे संकटों की जड़ मनुष्य की भीतरी अव्यवस्था में है। ऐसी समस्याओं का समाधान केवल कानूनों, नीतियों और तकनीकी उपायों से संभव नहीं है; इसके लिए मनुष्य को स्वयं को समझना भी होगा।
कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों में हुए अपने हालिया संवादों तथा अब ब्रिटिश पार्लियामेंट में संबोधन के संदर्भ में उन्होंने कहा कि सत्य कोई ऐसा उत्पाद नहीं है जिसे मैं अलग-अलग बाजारों के लिए अलग ढंग से तैयार कर सकूं। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रोताओं और परिस्थितियों के अनुसार भाषा और प्रस्तुति बदल सकती है, किंतु सत्य नहीं बदलता। वेदांत और आधुनिक विज्ञान के संबंध पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि दोनों अंततः एक ही प्रश्न पर आकर मिलते हैं – ‘किसके लिए?’ विज्ञान वस्तुओं और घटनाओं का अध्ययन करता है, जबकि वेदांत उस ज्ञाता की पड़ताल करता है जो समस्त अनुभवों का भोगता है।
जलवायु परिवर्तन पर अपने आगामी संवादों के संदर्भ में आचार्य प्रशांत ने कहा कि मैं जो कह रहा हूं वह यह है कि व्यापक स्तर पर आत्म-शिक्षा के बिना आप सफल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने कहा कि ग्रीन टेक्नोलॉजीज, नीतियां और आर्थिक उपाय आवश्यक हो सकते हैं, किंतु वे तब तक पर्याप्त सिद्ध नहीं होंगे जब तक वे मनुष्य की असीमित उपभोग-प्रवृत्ति तक नहीं पहुंचते।
आचार्य प्रशांत का यह संबोधन उनके व्यापक ब्रिटेन प्रवास की एक और महत्वपूर्ण कड़ी है। इससे पहले उन्होंने कैम्ब्रिज यूनियन में आयोजित कैम्ब्रिज इंडिया बिज़नेस डायलॉग 2026 के अंतर्गत अपने विचार रखे थे और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ईशावास्य उपनिषद पर एक विस्तृत दार्शनिक व्याख्यान दिया था। आगामी सप्ताहों में वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई), किंग्स कॉलेज लंदन तथा 20 से 28 जून तक आयोजित होने वाले लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक के विभिन्न सत्रों को संबोधित करेंगे। हाल ही में काठमांडू कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल 2026 में उनकी पुस्तक ‘ट्रुथ विदआऊट अपोलॉजी’ उन्हें सम्मानित भी किया गया।
प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक आचार्य प्रशांत ने अपने ब्रिटेन प्रवास को आत्मज्ञान के दर्शन से वैश्विक समस्याओं का सामना करने के प्रयास के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी देन उसके सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि वह आत्मज्ञान है जो पूरी मानवता के लिए हमेशा से अनिवार्य रहा है।
–आईएएनएस
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