आईआईटी मद्रास के 6 प्रोफेसर्स को सालाना 25 लाख रुपए का जेसी बोस अनुदान

नई दिल्ली, 7 अगस्त (आईएएनएस)। आईआईटी मद्रास के 6 वरिष्ठ प्रोफेसर्स का चयन अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) के प्रतिष्ठित जेसी बोस अनुदान के लिए किया गया है। इसके अंतर्गत हर एक वैज्ञानिक को हर साल 25 लाख रुपए मिलेंगे। यह सम्मान देश के उन वैज्ञानिकों और इंजीनियर्स को दिया जाता है, जिन्होंने रिसर्च के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया है। इस बार सम्मानित होने वाले वैज्ञानिकों में प्रो. सुजाता श्रीनिवासन, प्रो. थलप्पिल प्रदीप, प्रो. दीपा वेंकिटेश, प्रो. जितेंद्र एस. सांगवई, प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन व प्रो. सुंदरगोपाल घोष शामिल हैं।
आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटी ने सभी वैज्ञानिकों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सम्मान संस्थान में हो रहे उच्च गुणवत्ता वाले शोध का प्रमाण है। जेसी बोस अनुदान के तहत प्रत्येक वैज्ञानिक को 5 वर्षों तक हर साल 25 लाख रुपये मिलेंगे। यह राशि मानव संसाधन, उपकरण, शोध सामग्री, यात्रा, प्रयोग और अन्य अनुसंधान कार्यों पर खर्च की जा सकेगी। आईआईटी मद्रास की प्रो. सुजाता श्रीनिवासन ने कृत्रिम अंग और दिव्यांगजन के लिए सहायक उपकरण विकसित किए हैं।
संस्थान के मुताबिक उनकी टीम ने कम लागत वाले ऐसे उपकरण बनाए हैं, जो भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप हैं। इनमें नियोफ्लाई-नियोबोल्ट प्रणाली, स्टैंडिंग व्हीलचेयर, कदम कृत्रिम घुटना और हल्की व्हीलचेयर शामिल हैं। उनके नाम भारत और विदेशों में कई पेटेंट भी हैं। प्रो. थलप्पिल प्रदीप ने स्वच्छ पेयजल तकनीक, नैनो पदार्थ और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में विश्व स्तरीय रिसर्च की है। उनकी कम लागत वाली जल शुद्धिकरण तकनीक से देश के लाखों लोगों को सुरक्षित पेयजल मिला है। उन्हें पद्मश्री, विज्ञान श्री, एनी पुरस्कार और विनफ्यूचर पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान मिल चुके हैं। यह उनका तीसरा जेसी बोस कार्यकाल है।
प्रो. दीपा वेंकिटेश ऑप्टिकल कम्यूनिकेशन तकनीक की विशेषज्ञ हैं। इनके नेतृत्व में भारत का पहला मल्टी कोर फाइबर परीक्षण केंद्र आईआईटी मद्रास में स्थापित हुआ। इनका शोध उच्च क्षमता वाले संचार, सूक्ष्मतरंग प्रकाशिकी और संकेत प्रसंस्करण पर केंद्रित है। इनके नाम कई शोध पत्र और पेटेंट हैं। प्रो. जितेंद्र एस. सांगवई का शोध कार्बन कैप्चर और भंडारण, गैस हाइड्रेट तथा तेल और गैस अभियांत्रिकी पर आधारित है। इनके 200 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। 43 पेटेंट दायर किए हैं और लगभग 11,000 बार इनके शोध का उल्लेख किया जा चुका है। इन्हें राष्ट्रीय भूविज्ञान पुरस्कार सहित कई सम्मान मिले हैं।
वहीं प्रो. रामकृष्णन स्वामीनाथन ने चिकित्सा उपकरण और जैव-चिकित्सा यंत्रों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनका शोध मस्तिष्क और मांसपेशियों की कार्यप्रणाली को बेहतर ढंग से समझने वाले उपकरणों पर केंद्रित है। वे 550 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं और 50 से अधिक शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर चुके हैं। इनके अलावा प्रो. सुंदरगोपाल घोष का शोध बोरॉन आधारित रसायन विज्ञान पर केंद्रित है। उनके कार्य से उत्प्रेरण और छोटे अणुओं की सक्रियता के क्षेत्र में नई संभावनाएं खुली हैं। उन्होंने 325 से अधिक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र प्रकाशित किए हैं। उन्हें आईआईटी मद्रास का अनुसंधान एवं विकास पुरस्कार भी मिल चुका है।
गौरतलब है कि जेसी बोस अनुदान के लिए 45 से 65 वर्ष आयु के वैज्ञानिक और इंजीनियर पात्र होते हैं। चयन उनके शोध, पेटेंट, तकनीक विकास, शोध अनुदान और वैज्ञानिक उपलब्धियों के आधार पर किया जाता है। यह अनुदान देश के श्रेष्ठ वैज्ञानिकों को विज्ञान और अभियांत्रिकी के उभरते क्षेत्रों में बड़े और प्रभावशाली शोध करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
–आईएएनएस
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