कांठे महाराजः ढाई घंटे तक लगातार तबला वादन कर रचा था विश्व कीर्तिमान

नई दिल्ली, 31 जुलाई (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में महान कलाकारों की एक शानदार परंपरा रही है, इन्हीं में से एक थे पंडित कंठे महाराज। अपनी जबरदस्त प्रतिभा और तबला वादन में महारत के लिए मशहूर कांठे महाराज ने बनारस तबला घराने पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। उनका जीवन और कला संगीतकारों और संगीत के जानकारों, दोनों के लिए ही प्रेरणा का एक कभी न खत्म होने वाला स्रोत है।
पंडित कांठे महाराज का जन्म 1880 में बनारस शहर में हुआ था और 1 अगस्त 1970 को निधन हो गया था। संगीत की परंपरा वाले परिवार से होने के कारण, कांठे महाराज का रास्ता लय और सुर से जुड़ा होना तय था। कांठे महाराज ने बनारस घराने के सम्मानित उस्ताद और अपने पिता व गुरु, पंडित बलदेव सहाय की देखरेख में तबला सीखा।
कांठे महाराज ने कम उम्र से ही लय की अद्भुत प्रतिभा दिखाई और अपनी कला की कुशलता व परिपक्वता से दर्शकों को चकित कर दिया। उन्होंने उन जटिल रचनाओं को निखारने में अनगिनत घंटे बिताए, जिन्होंने आगे चलकर उनकी पहचान और विरासत को परिभाषित किया। पंडित कांठे महाराज अपनी बेमिसाल स्पष्टता और सटीकता के साथ जटिल लयबद्ध रचनाएं बनाने और उन्हें प्रस्तुत करने की अपनी प्रतिभा के लिए मशहूर थे। उनकी शैली में बनारस घराने की खासियत झलकती है, जो अपनी जीवंत और ऊर्जावान रचनाओं के लिए जाना जाता है। कांठे महाराज को प्रथम संगीतज्ञ माना जाता है, जिन्होंने तबला वादन द्वारा स्तुति प्रस्तुत की थी।
कांठे महाराज अपनी कल्पनाशील रचनाओं के लिए मशहूर थे, जिनमें वे परंपरा और नई सोच का बेहतरीन मेल बिठाते थे। उनकी शानदार ‘रेला’ रचनाएं (तेज गति वाले क्रम) बेहद असरदार होती थीं और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं। महाराज ने सोलो तबला बजाने की कला को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और तबले को एक ऐसे इंस्ट्रूमेंट के तौर पर पेश किया, जो बारीक कहानी कहने में काबिल था। उनकी सोलो परफॉर्मेंस मास्टरपीस थीं, जिनमें मैथमेटिकल सटीकता के साथ इमोशनलनेस का मेल था।
कांठे महाराज का टैलेंट उनके जीते-जी किसी से छिपा नहीं रहा। उनके परफॉर्मेंस ने शाही दरबारों, जाने-माने म्यूजिक फेस्टिवल और इंटरनेशनल स्टेज पर धूम मचाई, जिससे उन्हें बहुत नाम मिला। लगभग 70 वर्ष तक कांठे महाराज ने सभी विख्यात गायकों एवं नर्तकों को अपने तबले पर संगति दी। 1954 में ढाई घंटे लगातार तबला बजाने का विश्व कीर्तिमान स्थापित किया था।
कांठे महाराज ने सभी शैलियों में तबला वादन पर महारत प्राप्त की, किंतु इनकी विशेषता बनारस बाज में थी। 1961 में इन्हें संगीत नाटक अकादमी द्वारा सम्मानित किया गया था। 1 अगस्त, 1970 को 90 वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु हो गई। इनके भतीजे किशन महाराज भी विख्यात तबला वादक हैं।
पंडित कांठे महाराज ने बनारस घराने की पहचान बनाने में अहम भूमिका निभाई। यह घराना साफ उच्चारण, दमदार ताल और मुश्किल ‘पढ़ंत’ (लयबद्ध अक्षरों का उच्चारण) पर जोर देने के लिए जाना जाता है। कांठे महाराज की बनाई और मशहूर की गई रचनाओं को आज भी दुनिया भर के तबला वादक पूरे आदर के साथ बजाते हैं।
–आईएएनएस
ओपी/डीकेपी