आईबीसी से बैंकों को करीब 4.32 लाख करोड़ रुपए की वसूली करने में मदद मिली : केंद्र


नई दिल्ली, 28 मई (आईएएनएस)। दिवाला एवं शोधन अक्षमता कोड (आईबीसी), 2016 के अंतर्गत स्वीकृत समाधान योजनाओं के माध्यम से बैंकों ने लगभग 4.32 लाख करोड़ रुपए की वसूली की। यह परिसमापन मूल्य के 116.85 प्रतिशत तथा उचित मूल्य के 94.56 प्रतिशत से अधिक रही। यह जानकारी गुरुवार को जारी की गई सरकारी फैक्टशीट में दी गई।

फैक्टशीट में कहा गया कि दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के लागू होने के बाद से भारत की दिवाला और ऋण व्यवस्था में मजबूती आई है। इस ढांचे ने वसूली तंत्र को बेहतर बनाया, ऋणदाता अनुशासन को सुदृढ़ किया तथा संकटग्रस्त संस्थाओं के लिए अधिक संरचित समाधान प्रक्रिया स्थापित की।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 तक, संहिता के अंतर्गत 8,987 कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रियाएं (सीआईआरपी) स्वीकार की गईं। इनमें से 1,419 कॉरपोरेट देनदारों का समाधान स्वीकृत समाधान योजनाओं के माध्यम से किया गया। वहीं, कई अन्य मामलों का निपटारा समझौतों, अपीलों, पुनर्विचार याचिकाओं तथा धारा 12ए के अंतर्गत वापसी के माध्यम से किया गया।

आईबीसी ने बैंकिंग क्षेत्र में वसूली के परिणामों को भी बेहतर बनाया।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की “भारत में बैंकिंग की प्रवृत्तियों और प्रगति पर रिपोर्ट 2024-25″ (29 दिसंबर 2025 को जारी) के अनुसार, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) द्वारा विभिन्न माध्यमों से वसूल किए गए कुल 1,04,099 करोड़ रुपए में से केवल आईबीसी के माध्यम से ही 54,528 करोड़ रुपए की महत्वपूर्ण वसूली हुई, जो कुल वसूली का 52.4 प्रतिशत है। यह वसूली एसएआरएफएईएसआई, ऋण वसूली न्यायाधिकरणों (डीआरटी) और लोक अदालतों के माध्यम से हुई वसूली से अधिक थी।

फैक्टशीट में आईबीसी के प्रभावों को लेकर आईआईएम अहमदाबाद और आईआईएम बैंगलोर के अध्ययन के बारे में भी बताया गया।

आईआईएम अहमदाबाद के एक अध्ययन से पता चलता है कि आईबीसी के अंतर्गत समाधान प्राप्त करने वाली कंपनियों में समाधान के बाद उल्लेखनीय सुधार हुआ। ऋणदाताओं ने स्वीकृत दावों का 32 प्रतिशत तथा परिसमापन मूल्य का 168 प्रतिशत तक वसूल किया। समाधान प्राप्त कंपनियों की बिक्री में 76 प्रतिशत वृद्धि हुई, वे तीसरे वर्ष उस बिक्री स्तर तक पहुंच गई जिस पर किसी कंपनी की परिचालन आय शून्य हो गई और कर्मचारी व्यय में 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो अधिक रोजगार का संकेत है।

समाधान प्राप्त कंपनियों की कुल परिसंपत्तियों में 50 प्रतिशत वृद्धि हुई, पूंजीगत व्यय में 130 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और लाभप्रदता उद्योग मानकों के अनुरूप हो गई। सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार मूल्यांकन 2 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 6 लाख करोड़ रुपए हो गया, जबकि नकदी में 80 प्रतिशत सुधार हुआ।

आईआईएम बैंगलोर के एक अध्ययन से पता चलता है कि ऋण की लागत में 3 प्रतिशत की कमी आई और स्वतंत्र निदेशकों की संख्या बढ़ने से कॉरपोरेट प्रशासन में सुधार हुआ। इस प्रकार, ये अध्ययन दर्शाते हैं कि आईबीसी प्रक्रिया के माध्यम से समाधान प्राप्त करने वाली कंपनियों ने अपने व्यवसाय के विभिन्न पहलुओं—जैसे बिक्री, लाभप्रदता, परिसंपत्ति वृद्धि, बाज़ार मूल्यांकन और तरलता—में महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किए हैं।

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के लागू होने से पहले, भारत में दिवाला समाधान कई कानूनी ढांचों के जरिये संचालित होता था। वित्तीय संकट का सामना कर रही कंपनियों से विभिन्न कानूनों के अंतर्गत निपटा जाता था, जैसे कंपनी कानून, सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज़ एक्‍ट (एसआईसीए), ऋण वसूली तंत्र तथा एसएआरएफएईएसआई सहित सुरक्षित ऋणदाता ढांचे आदि। ये प्रक्रियाएं अलग-अलग संस्थानों और मंचों के माध्यम से संचालित होती थीं, जिसके कारण कार्यवाहियां बिखरी हुई और अधिकार-क्षेत्रों में ओवरलैप की स्थिति उत्पन्न होती थी।

इसके परिणामस्वरूप, समाधान प्रक्रियाएं अक्सर लंबी और अनिश्चित हो जाती थीं। मामले वर्षों तक लंबित रहते थे, जबकि संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का मूल्य लगातार घटता जाता था। देरी के कारण बैंकों की बकाया राशि वसूलने की क्षमता कमजोर पड़ती थी और व्यवहार्य व्यवसायों के पुनर्जीवन की संभावना भी कम हो जाती थी। एकीकृत और समयबद्ध तंत्र के अभाव ने समग्र ऋण अनुशासन और निवेशकों के विश्वास को भी प्रभावित किया।

इन संरचनात्मक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने व्यापक सुधार के रूप में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 को लागू किया।

–आईएएनएस

एबीएस/


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