संभावनाओं का साल 2026 : आदित्य-एल1 से सौर तूफानों की भविष्यवाणी में भारत को मिल सकती है बड़ी बढ़त

नई दिल्ली, 3 जनवरी (आईएएनएस)। ‘सोलर मिशन’ आदित्य-एल1 के योगदान से भारत शक्तिशाली सौर तूफानों को समझने और उनकी भविष्यवाणी करने के लिए बेहतर रूप से तैयार है। भारत के ‘सोलर मिशन’ से नए साल यानी 2026 में विज्ञान के क्षेत्र में नए चमत्कार देखने की संभावनाएं और अधिक होंगी।
भारत की पहली सौर अंतरिक्ष वेधशाला के रूप में आदित्य-एल1 अपने मिशन पर लगातार आगे बढ़ रहा है। यह साल आदित्य-एल1 के लिए खास होगा, क्योंकि यह सूर्य को उसके सबसे सक्रिय दौर ‘सोलर मैक्सिमम’ में देख सकता है।
अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के मुताबिक, सूर्य अपने सोलर मैक्सिमम चरण में प्रवेश कर चुका है। सौर चक्र एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसके दौरान सूर्य कम और अधिक चुंबकीय सक्रियता के चरणों से गुजरता है। लगभग हर 11 साल में सौर चक्र के चरम पर सूर्य के चुंबकीय ध्रुव उलट जाते हैं। इसका मतलब है कि सूर्य शांत अवस्था से अत्यधिक सक्रिय और तूफानी स्थिति में पहुंच जाता है।
नासा में स्पेस वेदर प्रोग्राम के निदेशक जेमी फेवर्स ने एक बयान में कहा था, “सौर अधिकतम के दौरान सौर धब्बों की संख्या बढ़ जाती है और इसके साथ ही सौर गतिविधि भी तेज हो जाती है। साथ ही पृथ्वी और पूरे सौर मंडल पर इसके वास्तविक प्रभाव भी पड़ते हैं।”
मई 2024 में आदित्य-एल1 ने पिछले दो दशकों में सबसे प्रबल सौर तूफान का सामना किया, जिसने पृथ्वी के पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया। इसे ‘गैनन तूफान’ कहा जाता है। यह सौर तूफान सूर्य पर होने वाले विशाल विस्फोटों की एक शृंखला से बनता है, जिन्हें प्रभामंडलीय द्रव्यमान उत्सर्जन (सीएमई) कहा जाता है। सीएमई, सूर्य की तरफ से अंतरिक्ष में छोड़े गए गर्म गैस और चुंबकीय ऊर्जा के एक विशाल बुलबुले जैसा होता है। जब ये बुलबुले पृथ्वी से टकराते हैं, तो ये हमारे ग्रह के चुंबकीय कवच को हिला सकते हैं और उपग्रहों, संचार प्रणालियों, जीपीएस और यहां तक कि विद्युत ग्रिड के लिए भी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकते हैं।
मई 2024 के सौर तूफान के दौरान, वैज्ञानिकों ने एक असामान्य चीज देखी। सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र, जो सौर तूफान के अंदर मुड़ी हुई रस्सियों की तरह होते हैं, तूफान के भीतर टूटकर फिर से जुड़ रहे थे। आमतौर पर, एक सीएमई एक मुड़ी हुई ‘चुंबकीय रस्सी’ लेकर चलता है जो पृथ्वी के पास आते ही पृथ्वी के चुंबकीय कवच से परस्पर क्रिया करती है। लेकिन इस बार, दो सीएमई अंतरिक्ष में टकराए और एक-दूसरे को इतनी जोर से दबाया कि उनमें से एक के अंदर की चुंबकीय क्षेत्र की रेखाएं टूट गईं और नए ढंग से फिर से जुड़ गईं, इस प्रक्रिया को चुंबकीय पुनर्संयोजन कहा जाता है। चुंबकीय क्षेत्र के इस अचानक विपर्यास ने तूफान के प्रभाव को पहले से कहीं ज्यादा शक्तिशाली बना दिया। उपग्रहों ने कणों की अचानक गति बढ़ने का भी पता लगाया, जो उनकी ऊर्जा में वृद्धि का संकेत है।
इस खोज के केंद्र में भारत की पहली सौर वेधशाला, आदित्य-एल1 है। शोधकर्ता पहली बार अंतरिक्ष के कई सुविधाजनक बिंदुओं से एक ही अत्यधिक शक्तिशाली सौर तूफान का अध्ययन कर सके। भारत के आदित्य-एल1 मिशन से सटीक चुंबकीय क्षेत्र माप की बदौलत, वैज्ञानिक इस पुनर्संयोजन क्षेत्र का मानचित्रण करने में सक्षम हुए। उन्होंने पाया कि जिस क्षेत्र में सीएमई का चुंबकीय क्षेत्र टूटकर फिर से जुड़ रहा था, वह बहुत बड़ा था (लगभग 1.3 मिलियन किलोमीटर चौड़ा, यानी पृथ्वी के आकार का लगभग 100 गुना)। यह पहला मौका था जब सीएमई के अंदर इतना बड़ा चुंबकीय विखंडन और पुनर्संयोजन देखा गया था।
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सूर्य से पृथ्वी की ओर आते समय सौर तूफानों के विकास के बारे में हमारी समझ बढ़ती है। यह वैश्विक अंतरिक्ष विज्ञान में भारत के बढ़ते नेतृत्व को दर्शाता है।
–आईएएनएस
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