जब एक साम्राज्य समुद्र पार चला गया और पुर्तगाल की राजधानी बनी ब्राजील


नई दिल्ली, 29 नवंबर (आईएएनएस)। 1807 का 29 नवंबर यूरोपीय इतिहास का वह दिन है, जब एक अनोखी और लगभग अविश्वसनीय लगने वाली घटना घटी। पुर्तगाल का शाही परिवार अपनी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ लिस्बन छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर ब्राजील पहुंच गया।

यह घटना न सिर्फ नेपोलियन युद्धों का नाटकीय मोड़ थी, बल्कि उपनिवेश और साम्राज्य के संबंधों की पारंपरिक समझ को भी बदल देने वाली थी। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी यूरोपीय साम्राज्य की प्रभावी राजधानी एक उपनिवेश में स्थापित हो गई।

उस समय नेपोलियन तेजी से पूरे यूरोप पर नियंत्रण स्थापित कर रहा था। उसने ‘कॉन्टिनेंटल सिस्टम’ लागू किया था, जिसके तहत ब्रिटेन से व्यापार करने वाले देशों पर दबाव और सैन्य कार्रवाई की जा रही थी। पुर्तगाल, जिसने ऐतिहासिक रूप से ब्रिटेन के साथ मजबूत सहयोग रखा था, फ्रांस का अगला लक्ष्य बना। जब नेपोलियन की सेना लिस्बन की ओर बढ़ी, तब पुर्तगाल पर ‘ब्रिगेंजा’ वंश का राज था और उस दौरान प्रिंस रीजेंट (पिता की अनुपस्थिति में कार्यभार संभालने वाले राजकुमार) जाओ ने ब्रिटिश नौसेना के संरक्षण में पूरा शाही दरबार, अधिकारियों, सैनिकों और परिवारों को लेकर अटलांटिक पार करने का फैसला किया।

ब्राजील पहुंचने के बाद रियो डी जेनेरियो एक साधारण उपनिवेशी बंदरगाह से अचानक यूरोपीय साम्राज्य की कार्यकारी राजधानी बन गया। व्यापार, प्रशासन, शिक्षा और कूटनीति की नई संरचनाएं बनीं। शाही आदेशों के साथ शहर में नई संस्थाएं खोली गईं—राष्ट्रीय पुस्तकालय, बैंक ऑफ ब्राजील और उच्च शिक्षण संस्थान—जिन्होंने बाद के दशकों में ब्राजील की आधुनिक पहचान को आकार दिया।

इस कदम का असर इतना गहरा था कि पुर्तगाली साम्राज्य का केंद्र ही मानो दक्षिण अमेरिका में स्थानांतरित हो गया। यूरोप छोड़ने का यह निर्णय अस्थायी था, लेकिन इसके परिणाम स्थायी साबित हुए। शाही दरबार की उपस्थिति ने ब्राजील में राजनीतिक चेतना को मजबूत किया और अंततः 1822 में ब्राजील ने स्वतंत्र साम्राज्य घोषित किया, जो आगे चलकर एक शक्तिशाली राष्ट्र-राज्य बना।

29 नवंबर 1807 की यह घटना सिर्फ युद्धकालीन रणनीति नहीं थी; यह वह क्षण था जिसने उपनिवेश और साम्राज्य के बीच की दूरी, प्रभाव और संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किया।

–आईएएनएस

केआर/


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