क्या है जोडिएक लाइट? जिसे कहा जाता है 'झूठी सुबह'

नई दिल्ली, 6 मार्च (आईएएनएस)। खगोल विज्ञान के कई रहस्य हमें हैरान करते हैं। इन्हीं में से एक रहस्य है जोडिएक लाइट, जिसे ‘छद्म सुबह’ (यानी सुबह जैसी लगने वाली, लेकिन वास्तव में वह सुबह नहीं होती) भी कहा जाता है। सूरज डूबने के बाद पश्चिम में या उगने से पहले पूर्व में दिखने वाली यह हल्की चमक सौर मंडल की बारीक धूल से सूरज की रोशनी के परावर्तन से बनती है।
यह दृश्य इतना सम्मोहक होता है कि अक्सर लोग इसे वास्तविक सूर्योदय समझ लेते हैं, जबकि यह ब्रह्मांड की धूल की खूबसूरत कहानी कहती है। रात के अंधेरे आसमान में कभी-कभी एक रहस्यमयी, हल्की चमकदार पिरामिड जैसी रोशनी दिखाई देती है, जो सूरज उगने से पहले पूर्व दिशा में या सूरज डूबने के बाद पश्चिम में फैली रहती है।
यह रोशनी इतनी हल्की और फैली हुई होती है कि लोग इसे सूर्योदय की शुरुआत समझ बैठते हैं। जोडिएक लाइट सौर मंडल में मौजूद बहुत बारीक धूल के कणों (इंटरप्लेनेटरी डस्ट) से सूरज की रोशनी के परावर्तन (रिफ्लेक्शन) और बिखराव से बनती है। ये धूल के कण धूमकेतु, क्षुद्रग्रहों की टक्करों से निकलते हैं और सौर मंडल में फैले रहते हैं। यह रोशनी सूरज के करीब ज्यादा चमकीली दिखती है और धीरे-धीरे कम होती जाती है, जिससे एक कोन या त्रिकोण जैसा आकार बनता है।
यह सबसे अच्छी तरह वसंत और शरद ऋतु के आसपास दिखाई देती है, क्योंकि तब यह क्षितिज से ज्यादा तिरछी होती है। उत्तरी गोलार्ध में वसंत में झूठी सुबह” के रूप में दिखती है। इक्वेटर के पास रहने वाले लोगों को यह ज्यादा साफ और चमकीली दिखती है, क्योंकि वहां प्रकाश प्रदूषण कम और दृश्यता बेहतर होती है।
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार, यह रोशनी नाइट स्काई में ऑरोरा, नॉक्टिलुसेंट बादलों या मिल्की वे जैसी अन्य चमक से अलग है। हाल की स्टडी में नासा के जूनो मिशन के वैज्ञानिकों ने पाया कि इस धूल का एक बड़ा स्रोत मंगल ग्रह के धूल भरे तूफान हो सकते हैं। जूनो स्पेसक्राफ्ट ने धूल कणों के टकराव रिकॉर्ड किए, जिससे पता चला कि मंगल से निकली धूल सौर मंडल में फैलकर यह चमक पैदा कर सकती है।
जोडिएक लाइट देखने के लिए अंधेरे इलाके में जाना जरूरी है, जहां शहर की लाइट्स या चंद्रमा की रोशनी न हो। यह ब्रह्मांड की सुंदरता का एक नायाब नजारा है, जो सौर मंडल की धूल की कहानी सुनाता है।
–आईएएनएस
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