यूएन ने जताई चिंता, तालिबान की पाबंदियों से अफगान महिलाओं तक मदद पहुंचाने में मुश्किल

काबुल, 10 मार्च (आईएएनएस)। संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (यूएनएएमए) ने चेतावनी दी है कि अफगानिस्तान में महिलाओं पर लगाए गए प्रतिबंध देश की तरक्की को नुकसान पहुंचा रहे हैं। स्थानीय मीडिया के अनुसार यूएनएएमए ने कहा कि ये प्रतिबंध मानवीय चुनौतियों को और खराब कर रहे हैं।
अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार की वापसी के बाद से देश में महिलाओं के खिलाफ कई प्रतिबंध लगाए गए हैं।
अफगानिस्तान की न्यूज एजेंसी खामा प्रेस ने बताया कि यूएनएएमए की कार्यवाहक प्रमुख जॉर्जेट गैगनन ने कहा कि तालिबान अफगानिस्तान में लोगों की भलाई के बजाय सोच वाली नीति को ज्यादा अहमियत दे रहा है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की एक मीटिंग में अपनी बात रखते हुए गैगनन ने कहा कि तालिबान का महिलाओं पर मानवीय संगठनों में काम करने पर बैन दिखाता है कि तालिबान की पॉलिसी मदद के कामों पर कैसे असर डाल रही है और एजेंसियों की कमजोर लोगों की मदद करने की काबिलियत को कैसे कम कर रही है।
उन्होंने कहा, “यूएन की महिला कर्मचारियों पर अब छह महीने का बैन लगा दिया गया है, जिससे अफगान महिलाओं तक मदद पहुंचाने और उन तक पहुंचने की संयुक्त राष्ट्र की काबिलियत में रुकावट आ रही है। उनके काम न करने से यूएन को उनकी स्किल और अनुभव से दूर रखा जा रहा है और अफगान महिलाओं और बड़े समुदाय को जरूरी मदद देने की हमारी काबिलियत कम हो रही है।”
उन्होंने कहा, “ये रोक यूएन कर्मचारियों के खास अधिकारों और इम्यूनिटी पर इंटरनेशनल नियमों का उल्लंघन हैं और यूएन चार्टर का भी उल्लंघन हैं। हम फिर से अधिकारियों से इन प्रतिबंध को हटाने और हमारे यूएन नेशनल महिला कर्मचारियों को उनके ऑफिस लौटने की इजाजत देने की अपील करते हैं।”
उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल फंडिंग में कमी, बढ़ती जरूरतों और बड़ी संख्या में माइग्रेंट्स की वापसी के साथ-साथ तालिबान की सख्त नीति की वजह से 2026 में अफगानिस्तान में मानवीय संकट और बिगड़ जाएगा।
गैग्नन ने बताया कि कई सालों से आर्थिक गिरावट की वजह से बड़े शहरी सेंटर बहुत ज्यादा दबाव में हैं और बार-बार आने वाली आपदाओं ने परिवारों की सामना करने की क्षमता को कमजोर कर दिया है, जिससे माइग्रेशन और अंदरूनी विस्थापन की नई लहरें आ रही हैं।
मानवाधिकार के साझेदारों ने 2026 में 17.5 मिलियन अफगानों की मदद के लिए लगभग 1.71 बिलियन डॉलर की मांग की है। हालांकि, यूएन अधिकारियों के मुताबिक, अभी तक सिर्फ लगभग 10 फीसदी फंडिंग ही मिली है।
सालों के संघर्ष, आर्थिक अलगाव और कम हुई अंतरराष्ट्रीय मदद की वजह से अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई है, जिससे लाखों लोग गुजारे के लिए मानवीय मदद और अनौपचारिक इनकम सोर्स पर निर्भर हो गए हैं।
इसके अलावा, अफगानिस्तान में महिलाओं के रोजगार और पढ़ाई पर लगी पाबंदियों की वजह से भी इनकम के मौके कम हो गए हैं, जिससे कई परिवार अनियमित काम पर निर्भर हो गए हैं, जबकि गरीबी और खाने की सुरक्षा बढ़ रही है।
यूएनडीपी ने कहा कि 84 फीसदी पुरुषों के मुकाबले सिर्फ सात फीसदी महिलाएं घर से बाहर काम करती हैं, जो अफगानिस्तान में रोजगार के मौकों में लिंग असमानता को दिखाता है।
–आईएएनएस
केके/वीसी