कम ऑक्सीजन में छिपा है ‘नए जीवन’ का रहस्य: रिसर्च ने खोला बड़ा राज


नई दिल्ली, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। जीवन के रहस्य वाकई अद्भुत और अकल्पनीय हैं। ऑक्सीजन हमारे वायुमंडल का बहुत उपयोगी तत्व है। जिंदगी में भी इसका योगदान अभूतपूर्व है। हाल ही में एक रिसर्च के आधार पर रिपोर्ट छपी जो दावा करती है कि कम ऑक्सीजन में भी नए जीवन का रहस्य छिपा है। आखिर क्या है ये?

दुनिया भर के वैज्ञानिक लंबे समय से यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर कुछ जीव—जैसे मेंढक या सलामेंडर—अपने कटे हुए अंगों को दोबारा कैसे उगा लेते हैं, जबकि इंसान ऐसा नहीं कर पाते। अब इस पहेली को सुलझाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। प्रतिष्ठित जर्नल साइंस में प्रकाशित रिसर्च ने इस रहस्य पर नई रोशनी डाली है।

कैन एज्टेकिन के नेतृत्व में एक टीम ने पाया कि अंगों के दोबारा बनने में ऑक्सीजन की बहुत अहम भूमिका रहती है। मेंढक के टैडपोल और एम्ब्रियोनिक चूहों के कटे हुए अंगों की तुलना कर, शोधकर्ताओं ने पाया कि सेल्स जिस तरह से ऑक्सीजन को महसूस करती हैं, उससे यह तय होता है कि दोबारा बनना शुरू हो भी सकता है या नहीं।

इस अध्ययन के मुताबिक, अंगों के दोबारा उगने (रीजेनरेशन) की क्षमता का सीधा संबंध हमारे शरीर में मौजूद ऑक्सीजन के स्तर से है। सरल शब्दों में कहें तो—जहां ऑक्सीजन कम होती है, वहां शरीर में “नया अंग बनाने” की प्रक्रिया सक्रिय हो सकती है, जबकि ज्यादा ऑक्सीजन इस प्रक्रिया को रोक देती है।

वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों में मेंढक के टैडपोल और चूहों के भ्रूण का उपयोग किया। टैडपोल ऐसे जीव हैं जो अपने अंगों को दोबारा विकसित करने में सक्षम होते हैं, जबकि चूहे और उसी तरह इंसान इस क्षमता से वंचित हैं। जब इन जीवों के टिशू (ऊतक) को अलग-अलग ऑक्सीजन स्तर पर रखा गया, तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए।

कम ऑक्सीजन वाले माहौल में कोशिकाएं तेजी से सक्रिय हो गईं और घाव भरने के साथ-साथ नए ऊतक बनाने लगीं। इस प्रक्रिया में एक खास प्रोटीन—एचआईएफ1ए—की महत्वपूर्ण भूमिका पाई गई। यह प्रोटीन कम ऑक्सीजन की स्थिति में “स्विच ऑन” होकर शरीर को मरम्मत से आगे बढ़ाकर रीजेनरेशन मोड में ले जाता है।

इसके विपरीत, जब ऑक्सीजन का स्तर ज्यादा था, तो कोशिकाएं जल्दी-जल्दी घाव को भरने के लिए “स्कार” यानी दाग बना देती हैं। यही कारण है कि इंसानों में कटे हुए अंगों की जगह सिर्फ निशान बन जाता है, नया अंग नहीं उगता।

इस शोध का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह संकेत देता है कि इंसानों के भीतर भी कहीं न कहीं रीजेनरेशन की क्षमता मौजूद हो सकती है, लेकिन हमारी जैविक प्रणाली उसे सक्रिय नहीं होने देती। यानी समस्या क्षमता की कमी नहीं, बल्कि उसे “चालू” करने के तरीके की है।

अगर भविष्य में वैज्ञानिक इस ऑक्सीजन-सेंसिंग सिस्टम को नियंत्रित करना सीख जाते हैं, तो चिकित्सा विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव संभव हैं।

–आईएएनएस

केआर/


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