ओरछा का भव्य महल, जहां की रसोई बनी भगवान श्रीरामचंद्र का दरबार, 'दशरथ नंदन' ने रखी थी रानी के सामने 'तीन शर्त'

ओरछा, 18 अप्रैल (आईएएनएस)। वास्तुकला की खूबसूरती, भक्ति और सुंदर कथाओं से भरी जगहें देखनी हो तो भारत में ऐसी जगहों की कमी नहीं, जहां भारत में कई ऐसी जगहें हैं जहां वास्तुकला की खूबसूरती आंखों को लुभाती है और भक्ति की कथाएं दिल को छू जाती हैं। मध्य प्रदेश के ओरछा में स्थित राजा महल भी ऐसी ही एक अनोखी जगह है। यहां का साधारण सा रसोईघर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का दिव्य दरबार बन चुका है, जहां उनकी पूजा राजा की तरह की जाती है। इस महल से जुड़ी प्राचीन कथा भक्ति, प्रेम और चमत्कार से भरी हुई है।
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बसा ओरछा का राजा महल सिर्फ एक भव्य इमारत नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और चमत्कार की अनोखी कहानी समेटे हुए है। यहां की रसोई आज भी भगवान श्रीराम का दरबार बनी हुई है, जहां उनकी पूजा राजा की तरह की जाती है।
इस महल से जुड़ी किंवदंती इतनी रोचक है कि पर्यटक यहां आकर इतिहास और आस्था दोनों का अनुभव करते हैं। इस महल को मुगल-राजपूत वास्तुकला का अनुपम नमूना भी कहा जाता है। 16वीं शताब्दी में बुंदेला राजा मधुकर शाह द्वारा बनवाया गया राजा महल मुगल और राजपूत वास्तुकला का शानदार संगम है। जहांगीर महल के ठीक बगल में स्थित यह महल अपनी मनमोहक मेहराबों, ऊंचे खंभों और सुंदर भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध है। महल के दरबार हॉल में हिंदू पौराणिक कथाओं के दृश्य दीवारों पर चित्रित हैं, जो देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। पिछले कुछ वर्षों में राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए संरक्षण और जीर्णोद्धार कार्य से महल अपनी पुरानी शान वापस पा चुका है।
किंवदंती के अनुसार, राजा मधुकर शाह भगवान कृष्ण के परम भक्त थे, जबकि उनकी पत्नी रानी गणेश कुंवरी भगवान राम की उपासक थीं। एक बार दोनों तीर्थयात्रा पर निकले। राजा मथुरा जाना चाहते थे, तो रानी अयोध्या। दोनों के बीच तीखी बहस हुई। क्रोध में आकर राजा ने रानी से कहा कि वह अकेले अयोध्या जाएं और भगवान राम को साथ लेकर लौटें, वरना महल में प्रवेश नहीं मिलेगा। रानी अयोध्या पहुंचीं और पूरी श्रद्धा से प्रार्थना करने लगीं। कई महीनों की प्रतीक्षा के बाद भी जब राम प्रकट नहीं हुए, तो निराश होकर उन्होंने सरयू नदी में कूदकर आत्महत्या करने का विचार किया। उसी क्षण चमत्कार हुआ। भगवान राम प्रकट हुए और रानी की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके साथ चलने को तैयार हो गए।
लेकिन उन्होंने रानी के सामने तीन शर्तें रखीं। पहली शर्त अयोध्या से ओरछा तक का पूरा सफर पुष्य नक्षत्र में 24 घंटे के अंदर पैदल तय करना होगा। दूसरी, जहां भी वे ठहरेंगे, वहां उनके साथ राजा जैसा बर्ताव किया जाएगा। वहीं, तीसरी शर्त यह थी कि ओरछा में वे जहां पहली बार विराजमान होंगे, वही जगह उनका स्थायी मंदिर बनेगी। रानी शर्तें मानकर ओरछा लौटीं। राजा मधुकर शाह ने भगवान राम को अपना मुकुट सौंप दिया और उनका राज्याभिषेक किया। इस तरह राम यहां ‘राम राजा’ के रूप में पूजे जाने लगे। उनके चारों ओर पहरेदार तैनात रहते हैं और राजसी सम्मान दिया जाता है।
कथा के अनुसार, राजा ने भगवान राम के लिए चतुर्भुज मंदिर बनवाना शुरू किया था, लेकिन जब रानी ओरछा पहुंचीं, तो मंदिर अधूरा था। हिंदू परंपरा के अनुसार, मंदिर बन जाने के बाद रसोई को भी पवित्र माना जाता है। इसलिए रानी ने भगवान राम को अपनी रसोई में ही विराजमान कर दिया। आज भी ओरछा का राम राजा मंदिर मूल रूप से महल की रसोई ही है। यही वजह है कि ओरछा को ‘दिव्य राजधानी’ कहा जाता है। यह भव्य महल न केवल आत्मिक शांति वाला महल है, बल्कि पर्यटकों के लिए आकर्षण भी है।
शाम के समय राजा महल की रोशनी इसे और भी खूबसूरत बना देती है। पर्यटक यहां गाइडेड टूर ले सकते हैं, जहां ओरछा के इतिहास और राम-रानी की कथा विस्तार से सुनाई जाती है। पास में स्थित जहांगीर महल, किले का इतिहास और शाम का साउंड एंड लाइट शो भी होता है। राम राजा मंदिर की आरती का अनुभव अनमोल है। स्थानीय बाजार में टेराकोटा की वस्तुएं, चंदेरी साड़ियां, पीतल के बर्तन और अगरबत्तियां खरीदना यहां आने वाले पर्यटकों का पसंदीदा काम है।
–आईएएनएस
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