दक्षिण चीन सागर विवाद: जापान पर भड़का बीजिंग, दूत को तलब कर दर्ज कराया विरोध

बीजिंग/टोक्यो, 13 जुलाई। चीन और जापान एक बार फिर आमने-सामने हैं। फिलहाल मुद्दे की जड़ में दक्षिण चीन सागर को लेकर जारी किया गया बयान है। दक्षिण चीन सागर को लेकर 2016 में आए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसले के समर्थन में जापान सहित 14 देशों ने ये संयुक्त बयान जारी किया। इसके बाद से ही चीन और जापान के बीच तनाव और बढ़ गया है। चीन ने जापानी दूतावास के वरिष्ठ अधिकारी को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया और टोक्यो पर क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को कमजोर करने का आरोप लगाया।
यह विवाद उस संयुक्त बयान के बाद सामने आया, जिसमें जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, फिलीपींस और कई यूरोपीय देशों ने हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के 2016 के फैसले की पुष्टि की। बयान में कहा गया कि यह फैसला अंतिम, कानूनी रूप से बाध्यकारी और चीन तथा फिलीपींस के बीच समुद्री दावों के संबंध में निर्णायक है।
चीन ने एक बार फिर इस फैसले को खारिज करते हुए इसे “बेकार कागज का टुकड़ा” बताया। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस फैसले का इस्तेमाल बाहरी शक्तियां दक्षिण चीन सागर में हस्तक्षेप और अस्थिरता पैदा करने के बहाने के रूप में कर रही हैं।
चीन की ओर से सोमवार को एक वीडियो भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पोस्ट किया गया। इसमें दक्षिण चीन सागर पर उसके हक और इसके जरिए विभिन्न देशों में होने वाले ट्रेड की बात है।
बीजिंग का दावा है कि दक्षिण चीन सागर के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से पर उसका ऐतिहासिक अधिकार है। हालांकि, इस क्षेत्र पर वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और इंडोनेशिया भी अपने-अपने विशेष आर्थिक क्षेत्रों (ईईजेड) के आधार पर दावा करते हैं।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि जापान दक्षिण चीन सागर विवाद का पक्षकार नहीं है और उसे चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी के बयान की निंदा करते हुए कहा कि उन्होंने चीन के वैध दावों पर हमला किया और जापान को दक्षिण चीन सागर का “वैध हितधारक” बताकर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया।
चीन ने जापान पर द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि टोक्यो एक बार फिर क्षेत्रीय मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है। प्रवक्ता ने कहा कि इससे लोगों को जापान के अतीत के सैन्य विस्तारवाद की याद आती है और उसकी कथित नव-सैन्यवाद (नियो-मिलिटैरिज्म) की नीति को लेकर चिंता बढ़ती है।
चीन ने यह भी आरोप लगाया कि जापान फिलीपींस के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाकर दक्षिण चीन सागर में तनाव को बढ़ावा दे रहा है।
इस बीच, जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरू किहारा ने कहा कि उनका देश समुद्री क्षेत्रों में कानून के शासन को बनाए रखने और मजबूत करने का लगातार समर्थन करता रहा है। उन्होंने कहा कि 14 देशों का संयुक्त बयान अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर शांतिपूर्ण, स्थिर और मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दोहराता है।
12 जुलाई 2016 को हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि के तहत अपने फैसले में कहा था कि दक्षिण चीन सागर में चीन के तथाकथित “नाइन-डैश लाइन” के आधार पर किए गए व्यापक दावों का अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है। चीन ने उस फैसले को कभी स्वीकार नहीं किया और आज भी उसे अवैध, अमान्य और गैर-बाध्यकारी करार देता है।
–आईएएनएस
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