पोषण अभियान: 14 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों और 9 करोड़ लाभार्थियों की संभव हुई डिजिटल निगरानी


नई दिल्ली, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। सरकार ने मंगलवार को बताया कि अब मिशन के तहत पोषण ट्रैकर एप्लिकेशन जैसे डिजिटल टूल्स की मदद से देश भर के 14 लाख से ज्यादा आंगनवाड़ी केंद्रों और करीब 9 करोड़ लाभार्थियों की लगभग रियल-टाइम निगरानी संभव हो पाई है।

मंगलवार को एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि पोषण अभियान के 8 साल पूरे होने पर, इसके ‘जन आंदोलन’ मॉडल ने पूरे देश में लोगों को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई है। पोषण माह और पोषण पखवाड़ा जैसे अभियानों के जरिए अब तक 150 करोड़ से ज्यादा गतिविधियां आयोजित की जा चुकी हैं।

बयान में कहा गया कि यह मिशन पोषण से जुड़ी समस्याओं को हल करने के लिए तकनीक, बेहतर तालमेल (कन्वर्जेंस) और समुदाय की भागीदारी पर बढ़ते फोकस को दिखाता है।

कार्यक्रम के विकास से यह स्पष्ट हुआ है कि अलग-अलग क्षेत्रों के बीच बेहतर समन्वय, मजबूत सेवा वितरण और लोगों की आदतों में बदलाव लाने के निरंतर प्रयास, पोषण सुधार के लिए बेहद जरूरी हैं।

‘मिशन पोषण 2.0’ में बदलाव के साथ सेवा की गुणवत्ता सुधारने, बच्चों की शुरुआती देखभाल बढ़ाने और अंतिम स्तर तक सेवाएं पहुंचाने पर खास ध्यान दिया गया है।

सरकार ने बताया कि इस मिशन के तहत पोषण को स्वास्थ्य, शिक्षा, शुरुआती बाल देखभाल और सामुदायिक भागीदारी से जोड़ा गया है ताकि कमजोर वर्गों को समग्र सहायता मिल सके।

8 मार्च 2018 को शुरू हुआ ‘पोषण अभियान’ भारत के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव लेकर आया। पहले जहां पोषण को सिर्फ कल्याण योजना माना जाता था, अब इसे मानव संसाधन विकास, सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) और दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि से जोड़ा जा रहा है।

इस मिशन के तहत 26 से ज्यादा मंत्रालयों और विभागों को एक साथ लाकर पोषण सुधार के लिए एकीकृत ढांचा तैयार किया गया है, जिसमें स्वच्छता, शिक्षा, पानी, महिला सशक्तिकरण और आय जैसे पहलुओं पर एक साथ काम किया जा रहा है।

सबसे अहम बात यह है कि पोषण अभियान को ‘लाइफसाइकिल’ और ‘प्रिवेंटिव’ यानी रोकथाम के नजरिए से तैयार किया गया है। इसका फोकस कुपोषण होने के बाद इलाज पर नहीं, बल्कि पहले से ही उसे रोकने पर है।

यह मिशन खास तौर पर बच्चे के जीवन के पहले 1,000 दिनों (गर्भावस्था से लेकर 2 साल की उम्र तक) पर ध्यान देता है, जो शारीरिक विकास, दिमागी विकास और आगे की सेहत के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

इसके अलावा, आंगनवाड़ी केंद्रों, सरकारी स्कूलों और ग्राम पंचायतों में ‘पोषण वाटिका’ यानी न्यूट्री-गार्डन भी बनाए जा रहे हैं, जिससे लोगों को सस्ती और आसानी से उपलब्ध पौष्टिक फल, सब्जियां और औषधीय पौधे मिल सकें।

–आईएएनएस

डीबीपी


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