पीएम मोदी का दक्षिणी राज्यों को आश्वस्त करने की अचानक चिंता दूरदर्शी सोच के बजाय चुनावी संदेश ज्यादा : सीएम सिद्धारमैया

बेंगलुरु, 5 अप्रैल (आईएएनएस)। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिसीमन (डेलिमिटेशन) प्रक्रिया संबंधी हालिया टिप्पणी पर जोरदार प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने रविवार को कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा दक्षिणी राज्यों को आश्वस्त करने की अचानक चिंता चुनावी संदेश ज्यादा लगती है, न कि किसी राजनेता की दूरदर्शी सोच।
सिद्धारमैया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करके लिखा, “मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करता हूं कि उन्होंने आखिरकार प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया पर अपनी चुप्पी तोड़ी है। दक्षिणी राज्यों को ‘आश्वस्त’ करने की यह अचानक दिखाई गई चिंता, राजनेता की सोच से ज्यादा चुनावी संदेश लगती है, जिसका समय केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर तय किया गया है।”
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि मुद्दा दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने या न बढ़ने का नहीं है। असली चिंता इस बात की है कि सीटें किस अनुपात में बढ़ेंगी और इसका फायदा किसे ज्यादा मिलेगा। उन्होंने आंकड़ों के आधार पर दावा किया कि प्रस्तावित विस्तार में भाजपा-शासित उत्तरी और कुछ अन्य राज्यों को अधिक लाभ पहुंच रहा है, जबकि दक्षिणी राज्यों को अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी मिल रही है।
सिद्धारमैया ने कहा कि लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है। इसमें उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 (+40), महाराष्ट्र की 48 से 72 (+24), बिहार की 40 से 60 (+20), मध्य प्रदेश की 29 से 43-44 (+14-15), राजस्थान की 25 से 37-38 (+12-13) और गुजरात की 26 से 39 (+13) होने की संभावना है। इसके विपरीत, दक्षिणी राज्यों की स्थिति इस प्रकार बताई गई कि कर्नाटक की सीटें 28 से बढ़कर 42 (+14), तमिलनाडु की 39 से 58-59 (+20), आंध्र प्रदेश की 25 से 37-38 (+12-13), तेलंगाना की 17 से 25-26 (+8-9) और केरल की 20 से 30 (+10)।
उन्होंने आंकड़े देते हुए कहा कि पांचों दक्षिणी राज्यों को कुल 63-66 अतिरिक्त सीटें ही मिलेंगी, जबकि सिर्फ सात भाजपा-शासित राज्यों को लगभग 128-131 अतिरिक्त सीटें मिल जाएंगी, जो दोगुनी से भी ज्यादा है। परिसीमन के बाद भी दक्षिणी राज्यों का कुल हिस्सा लोकसभा में लगभग 24 प्रतिशत ही बना रहेगा, जो पहले से कम है।
सिद्धारमैया ने चेतावनी दी कि जनसंख्या नियंत्रण और बेहतर शासन में सफल राज्यों को सजा मिल रही है। कर्नाटक, जो देश के आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण इंजन है, जानबूझकर हाशिए पर धकेला जा रहा है। उन्होंने कहा, “अगर बड़े राज्यों का संख्याबल बढ़ने के बावजूद हमारा हिस्सा नहीं बढ़ता, तो फिर इस पूरी प्रक्रिया से कर्नाटक को आखिर क्या फायदा हो रहा है?”
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि इससे राज्यों के बीच असंतुलन और बढ़ेगा। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के पास कर्नाटक से 52 सीटें ज्यादा हैं, जो बढ़कर 78 हो जाएगी। महाराष्ट्र की बढ़त भी 20 से बढ़कर 30 हो जाएगी। यह सिर्फ सीटों का विस्तार नहीं, बल्कि सत्ता का केंद्रीकरण है।
उन्होंने जोर देकर कहा, “यह सहकारी संघवाद नहीं है, यह संघवाद पर एक और खुला हमला है। दक्षिण के लोगों का भरोसा जीतने में नाकाम रहने के बाद, मोदी सरकार अब प्रतिनिधित्व के हेर-फेर वाले पुनर्गठन के जरिए हमारी आवाज को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।”
सिद्धारमैया ने मांग की कि इस तरह का ढांचागत बदलाव बिना किसी सलाह-मशविरे या सार्वजनिक बहस के थोपा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि आर्थिक और वैश्विक चुनौतियों के इस दौर में केंद्र सरकार राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के बजाय राजनीतिक हिसाब-किताब पर ज्यादा ध्यान दे रही है।
अंत में मुख्यमंत्री ने लिखा, “कर्नाटक के लोग और वे सभी जो संघवाद में विश्वास रखते हैं, निष्पक्षता, सम्मान और पारदर्शिता के हकदार हैं। हम अपनी आवाज को कमजोर करने की किसी भी कोशिश का पूरी मजबूती से विरोध करेंगे।”
–आईएएनएस
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