ग्रामोफोन की दुकान से भारत रत्न तक: पंडित भीमसेन जोशी का सुरों से भरा सफर


मुंबई, 3 जनवरी (आईएएनएस)। कई बार इतिहास की बड़ी कहानियां बहुत छोटी जगहों से जन्म लेती हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान साधक पंडित भीमसेन जोशी की कहानी मामूली सी ग्रामोफोन की दुकान से शुरू हुई। बचपन में स्कूल से लौटते वक्त ग्रामोफोन पर बजते गानों को सुनना उनकी एक ऐसी तैयारी थी, जिसने आगे चलकर उन्हें सुरों की दुनिया का बादशाह बना दिया। उसी दुकान में खड़े होकर सुने गए रागों ने उनके अंदर संगीतकार बनने के आत्मविश्वास को मजबूत किया।

पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गड़ग जिले में हुआ था। वे अपने परिवार में सबसे बड़े थे, और घर का माहौल पढ़ाई और अनुशासन से जुड़ा हुआ था। उनके पिता, गुरुराज जोशी, भाषाओं के विद्वान थे, लेकिन परिवार में कोई भी संगीत से जुड़ा नहीं था। इसके बावजूद, भीमसेन का मन बचपन से ही सुरों की ओर खिंचता था। स्कूल से लौटते समय वे अक्सर ग्रामोफोन और ट्रांजिस्टर की दुकानों के सामने रुक जाते। वहां बजते रिकॉर्ड को ध्यान से सुनते, फिर उन्हीं धुनों को गुनगुनाने की कोशिश करते। ग्रामोफोन की दुकान उनके जीवन की पहली ‘म्यूजिक क्लास’ बन गई।

संगीत के प्रति दीवानगी के चलते उन्होंने महज 11 साल की उम्र में घर छोड़ दिया। वह गुरु की तलाश में निकल पड़े। उस उम्र में न मंजिल का पता था, न रास्ते की समझ, बस भीतर संगीत सीखने का जुनून था। इस दौरान वह कई शहरों में भटके। उन्होंने कभी मंदिरों के बाहर गाया, कभी गलियों में। इसी तलाश में उनकी मुलाकात महान गुरु पंडित सवाई गंधर्व से हुई। उन्होंने भीमसेन से साफ कहा कि अगर उनसे सीखना है तो अब तक जो भी सीखा है, उसे भूलना होगा। भीमसेन जोशी ने बिना किसी झिझक यह शर्त स्वीकार कर ली और यहीं से उनकी असली संगीत साधना शुरू हुई।

साल 1941 में, 19 वर्ष की उम्र में, उन्होंने पहली बार मंच पर अपनी प्रस्तुति दी। उनकी आवाज में ताकत और भाव दोनों था। इसके बाद वे मुंबई पहुंचे और रेडियो कलाकार के रूप में काम करने लगे। रेडियो के जरिए उनकी आवाज देश के कोने-कोने तक पहुंचने लगी। 20 साल की उम्र में उनका पहला एल्बम रिलीज हुआ, जिसने उन्हें शास्त्रीय संगीत जगत में एक अलग पहचान दिलाई।

पंडित भीमसेन जोशी ख्याल गायकी के महान कलाकार माने जाते हैं। दरबारी, मालकौंस, तोड़ी, यमन, भीमपलासी, ललित और शुद्ध कल्याण जैसे रागों में उनकी पकड़ काफी मजबूत थी। शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ उन्होंने भजन और विट्ठल भी गाए। उनकी गायकी में वही सादगी और गहराई थी, जो कभी ग्रामोफोन की दुकान पर खड़े उनकी आंखों में दिखाई देती थी।

अहम योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और 2008 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। 24 जनवरी 2011 को लंबी बीमारी के बाद पंडित भीमसेन जोशी का निधन हो गया।

–आईएएनएस

पीके/डीकेपी


Show More
Back to top button