पाकिस्तान की तरफ से बांग्लादेश के लिए भाईचारे का संदेश दिखावा है : रिपोर्ट


ढाका, 4 जुलाई (आईएएनएस)। पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच हाल के दिनों में बढ़ती कूटनीतिक नजदीकियां उस मानवीय त्रासदी के बिल्कुल विपरीत दिखाई देती हैं, जो कराची की मछर कॉलोनी और मूसा कॉलोनी जैसी तंग और खुले नालों वाली झुग्गी बस्तियों में सामने आ रही है। यहां अनुमानित 30 लाख बांग्लादेशी मूल के बंगाली ऐसे हालात में रह रहे हैं, जिनकी तरफ न तो सरकार का ध्यान है और न ही नगर प्रशासन का।

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी धरती पर पैदा होने और आधी सदी से ज्यादा समय से वहां रहने के बावजूद, सरकार उनके साथ गलत बर्ताव करती है।

बांग्लादेशी मीडिया ‘डेली वादा’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “पाकिस्तान एक ओर बांग्लादेश के साथ कूटनीतिक संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि दूसरी ओर उनकी अपनी ही सीमाओं के भीतर रहने वाले लाखों बंगालियों का जीवन बदहाल है।”

रिपोर्ट के अनुसार, “यह आबादी 1971 के रक्तरंजित विभाजन की विरासत है। जब पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर स्वतंत्र बांग्लादेश बना, तब लाखों बंगाली पश्चिमी पाकिस्तान, खासकर कराची के बंदरगाहों और मछली उद्योग से जुड़े इलाकों में रह गए। समय के साथ उनकी आबादी लगातार बढ़ती गई।”

इसमें आगे कहा गया, “आज, बंगालियों की तीन पीढ़ियां सिर्फ पाकिस्तान की मिट्टी को जानती हैं। वे उर्दू बोलते हैं, क्रिकेट मैचों में पाकिस्तानी झंडा लहराते हैं और आर्थिक योगदान देते हैं। फिर भी, उन्हें सबसे जरूरी कागजात ‘राष्ट्रीय पहचान पत्र’ तक नहीं दिया जाता।”

रिपोर्ट में कहा गया कि सिविल लाइफ के इस डिजिटल पासपोर्ट के बिना, कोई भी व्यक्ति सरकार की नजर में नहीं रहता। वे वोट नहीं दे सकते, बैंक अकाउंट नहीं खोल सकते, प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकते या आधिकारिक तौर पर कोई नौकरी नहीं पा सकते। कराची की बंगाली कॉलोनियों के युवाओं के लिए, डॉक्यूमेंटेशन की कमी एक ऐसी दीवार बन जाती है, जिसे पार नहीं किया जा सकता।

रिपोर्ट में बताया गया कि 2024 के जुलाई विद्रोह के दौरान शेख हसीना की सरकार के हटने के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच एक दशक से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंध सुधरने लगे और पाकिस्तानी डिप्लोमैट और सैन्य अधिकारियों ने बांग्लादेश के लोगों के लिए रेड कार्पेट बिछाया।

इसमें कहा गया, “पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार समेत बड़े लोग अंतरिम सरकार के समय में ढाका गए और इंटेलिजेंस शेयरिंग, मिलिट्री कोऑपरेशन, स्टूडेंट स्कॉलरशिप और ट्रेड रूट्स को फिर से शुरू किया गया।”

रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया, “अगर इस्लामाबाद का मौजूदा नेतृत्व सच में ढाका के साथ सच्ची साझेदारी चाहता है, तो वह अब यह दिखावा नहीं कर सकता कि ये 30 लाख लोग नहीं हैं। बांग्लादेश के लिए भाईचारे का संदेश खोखला लगता है, जबकि कराची की झुग्गियों के बच्चों को सिर्फ उनके इतिहास की वजह से पढ़ाई का हक नहीं दिया जा रहा है।”

–आईएएनएस

केके/एबीएम


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