पाकिस्तान: खैबर पख्तूनख्वा की तिराह घाटी में एक बार फिर विस्थापन, हिंसा और अविश्वास का साया

इस्लामाबाद, 2 फरवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के खैबर जनजातीय जिले की तिराह घाटी एक बार फिर बड़े पैमाने पर विस्थापन की मार झेल रही है। प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के खिलाफ प्रस्तावित “सीमित सैन्य अभियान” की चर्चाओं के बीच स्थानीय लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। यह पलायन तिराह घाटी के अशांत इतिहास का एक और अध्याय जोड़ता है, जहां आम नागरिक संघीय सरकार और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति का खामियाजा भुगत रहे हैं।
पाकिस्तान के प्रमुख अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में प्रकाशित एक लेख में इस्लामाबाद स्थित पत्रकार और विश्लेषक इहसानुल्लाह टीपू महसूद ने लिखा कि बीते दो दशकों में जनजातीय इलाकों और मलाकंड डिवीजन में कम से कम 12 बड़े आतंकवाद-रोधी अभियान चलाए जा चुके हैं। हर बार तालिबान के खात्मे का दावा किया गया, लेकिन हकीकत यह है कि हिंसा खत्म होने के बजाय और अधिक जटिल व उग्र होती गई। तिराह घाटी समेत पूरे जनजातीय क्षेत्र के लोग आज भी यही सवाल कर रहे हैं कि क्या हिंसा का यह चक्र कभी थमेगा।
मुद्दा अब राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है। संघीय और प्रांतीय सरकारें एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टाल रही हैं, जबकि स्थानीय लोगों के घर उजड़ चुके हैं, आजीविका नष्ट हो गई है और जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। हर सैन्य अभियान के बाद स्थिरता, पुनर्निर्माण और पुनर्वास के वादे किए गए, लेकिन बाद के चरणों में इन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया। ऐसे में कड़ाके की सर्दी के बावजूद लोग एक बार फिर सरकारी आश्वासनों पर भरोसा कर अपने घर खाली करने को मजबूर हैं।
लेख में यह भी कहा गया है कि हाल के महीनों में मुख्यधारा और सोशल मीडिया पर खैबर पख्तूनख्वा और पूर्ववर्ती फाटा के पश्तूनों को लेकर नकारात्मक और रूढ़िवादी छवि गढ़ी जा रही है। इससे अलगाव बढ़ रहा है और 2018 में हुए फाटा विलय के उद्देश्यों को नुकसान पहुंच रहा है। आरोप है कि सरकार अपनी विफलताओं का ठीकरा स्थानीय लोगों पर फोड़ने के लिए मीडिया का सहारा ले रही है, जबकि जमीनी हकीकत से अनजान विश्लेषकों को राष्ट्रीय विमर्श गढ़ने के लिए आगे किया जा रहा है।
कुछ गैर-राजनीतिक स्थानीय निवासियों का कहना है कि तिराह घाटी को नशे की खेती, तस्करी और आतंकवाद की फंडिंग का केंद्र बताकर बदनाम किया गया, जबकि क्षेत्र की जटिल परिस्थितियों को समझने का प्रयास नहीं हुआ। उनके अनुसार मौजूदा अभियान आतंकवाद खत्म करने से ज्यादा संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच राजनीतिक हिसाब-किताब का हिस्सा प्रतीत होता है।
24 सदस्यीय स्थानीय जिरगा द्वारा 10 जनवरी तक क्षेत्र खाली करने के फैसले पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि फाटा के खैबर पख्तूनख्वा में विलय के बाद ऐसे निर्णय का अधिकार केवल प्रांतीय सरकार को है। वहीं, मुख्यमंत्री के सूचना मामलों के विशेष सहायक शफी जान ने दावा किया कि जिरगा के बुजुर्गों पर हस्ताक्षर के लिए दबाव डाला गया, हालांकि अधिकारियों ने इस आरोप से इनकार किया है।
–आईएएनएस
डीएससी