नेपाल के भारत से जुड़े हैं हित, नई सरकार को रखना होगा ध्यान: पूर्व पीएम देउबा के सलाहकार सुवेदी

काठमांडू, 7 मार्च (आईएएनएस)। नेपाल चुनाव में एक नई पार्टी ने जीत की पटकथा लिख दी है। बदलाव की बयार ऐसी बह रही है कि पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली को भी काठमांडू के पूर्व मेयर ने करीब 50 हजार मतों से मात दे दी। आईएएनएस से विशेष बातचीत में पूर्व पीएम शेर बहादुर देउबा के प्रेस सलाहकार और वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अरुण के. सुवेदी ने बदलते परिदृश्य पर अपने विचार साझा किए और सत्ता पर काबिज दल को भारत को ध्यान में रख विदेश नीति में बदलाव की सलाह दी।
सुवेदी ने कहा कि सत्ता पर काबिज होने वाली सरकार को विदेश नीति में कुछ बदलाव करने को तैयार रहना पड़ेगा। उन्होंने कहा, “नए राजनीतिक दल, आरएसपी को मौजूदा संविधान में बदलाव करने पर विचार करने की जरूरत है, क्योंकि विदेशी मामलों से जुड़े कुछ प्रावधान पुराने हो चुके हैं। एक बार संविधान में बदलाव हो जाने के बाद, आरएसपी सरकार को राष्ट्रीय हित के आधार पर विदेश नीति अपनानी होगी।”
फिर भारत को ध्यान में रखने की सलाह देते हुए कहा, “हमारा भूगोल एक दूसरे से मिलता है, सीमाएं मिलती हैं, अर्थव्यवस्था भी एक सी ही है, और हम सांस्कृतिक तौर पर भी जुड़े हैं। लेकिन हमारा संविधान पाकिस्तान और भारत से एक जैसे रिश्ते रखने को कहता है। हमें उनसे भी अच्छे से संबंध रखने हैं। ऐसा वामपंथी विचारधारा के चलते हुआ है। सो प्रमुख नीति होनी चाहिए भारत से जुड़े हितों पर ध्यान देना।”
भारत पर निर्भरता को लेकर आगे बोले, “हमारी एनर्जी सिक्योरिटी काफी हद तक भारत पर निर्भर है। नेपाल के पास अपनी पेट्रोलियम रिफाइनरी नहीं है, और हमारे पास एलएनजी या एलपीजी पाइपलाइन सिस्टम नहीं है—इसलिए हम ईंधन और गैस के लिए पूरी तरह से भारतीय सप्लाई चैनल पर निर्भर हैं… हमें उम्मीद है कि भारत अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को अच्छे से मैनेज करता रहेगा।”
नेपाल की राजनीति में आए बदलाव पर सुवेदी ने कहा, “मैं खुश हूं कि नेपाल में लेफ्ट धराशायी हुआ है और सिर्फ इतनी सलाह है कि नए बैनर तले जुटें जो गैर-वामपंथी हो।”
उन्होंने दावा किया कि अगर नेपाली कांग्रेस खुद को बदलती है तो फिर से सत्ता में आने में कामयाब रहेगी। बोले, “मेरा मानना है कि उन्हें अपने सैद्धांतिक विचारधारा में सुधार लाना होगा। उन्हें सिर्फ एक ही सलाह है कि वो एकजुट हों और समाजवाद से परे सुधारवादी, पूंजीवादी और मॉडरेट कंजर्वेटिज्म नजरिया रखें। अगर वो बदलेंगे तो अगले चुनाव में जरूर सत्ता में आएंगे। पॉपुलर कंजर्वेटिज्म के विचार पर बढ़े तो पीएम मोदी और ट्रंप की तरह सफल होंगे।
इसके साथ ही सुवेदी ने लोकप्रियता के आधार पर सत्ता पर काबिज होने की रीति-नीति पर भी विचार रखे। वो बोले, ” यहां मैं कहना चाहूंगा कि पॉपुलिज्म नेपाल की सभी समस्याओं का हल नहीं है। पॉपुलिज्म के नतीजे शॉर्ट टर्म हो सकते हैं लेकिन इससे व्यावहारिक आर्थिक प्रबंधन और विदेशी मामलों की चुनौतियों से निपटने के लिए आगे बढ़ना बहुत अलग मामला है।”
जब पूछा गया कि क्या बढ़ती राजनीतिक जागरूकता और जेन-जी वोटर्स के विरोध ने नेपाल में चुनाव के नतीजों पर असर डाला, तो सुवेदी बोले, “ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने सोशल मीडिया पर बैन लगाने के लिए कुछ नीति लागू की थीं, और डिजिटल एसेट्स के लिए कोई कानूनी ढांचा नहीं था, जिससे आज के ज्यादातर युवा वाकिफ हैं। इससे खास वर्ग के युवाओं में काफी निराशा थी। यह आंदोलन खास वर्ग के युवाओं ने चलाया था, न कि वंचित पृष्ठभूमि के युवाओं ने।”
नेपाल चुनाव में वोटर के व्यवहार में आए बदलाव के कारकों पर सुवेदी ने प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “पहला, पिछली सरकार की आर्थिक नीति। वामपंथी नेतृत्व वाली सरकारें पूरी तरह फेल हो गई हैं—उनकी इकोनॉमिक पॉलिसी फेल हो गई। दूसरा, उनका अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में पिछड़ना रहा । कम्युनिस्ट सरकार ने विदेशी मामलों से जुड़े कई फैसले वामपंथी विचारों के आधार पर लिए। बदकिस्मती से, नेपाली कांग्रेस पार्टी उस सरकार का हिस्सा थी और विदेश मंत्रालय का जिम्मा उस पर ही थी।”
–आईएएनएस
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