महाश्वेता देवी: आदिवासियों और दलितों की आवाज, जिन्होंने अपनी कलम से समाज को दिखाया आईना


नई दिल्ली, 13 जनवरी (आईएएनएस)। आज हम एक ऐसी शख्सियत को याद कर रहे हैं, जिसने अपनी कलम और काम दोनों से समाज के हाशिए पर जी रहे लोगों को आवाज दी और भारतीय साहित्य तथा सामाजिक चेतना में अमिट छाप छोड़ी। उनकी रचनाओं ने सिर्फ साहित्य को समृद्ध नहीं किया, बल्कि उन लोगों की कहानी भी दुनिया के सामने लाई, जो अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते थे।

महाश्वेता देवी 14 जनवरी 1926 को ढाका (अब बांग्लादेश) में जन्मी थीं। उनके पिता मनीष चंद्र घटक एक कवि और उपन्यासकार थे, जबकि उनकी मां धरित्री देवी सामाजिक कार्यकर्ता थीं। बचपन में ही उन्हें साहित्य और समाज सुधार की प्रेरणा मिलना शुरू हो गया था। भारत विभाजन के दौरान किशोरावस्था में उनका परिवार पश्चिम बंगाल आकर बस गया। बाद में उन्होंने शांति निकेतन के विश्व भारती विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।

कम उम्र में ही महाश्वेता ने लेखन शुरू कर दिया। उनकी पहली गद्य कृति ‘झांसी की रानी’ (1956) ने उन्हें साहित्यिक दुनिया में पेश किया। इस रचना में उन्होंने 1857-58 की क्रांति के दृश्य जीवंत किए और रानी लक्ष्मीबाई के साथ-साथ अन्य क्रांतिकारियों के संघर्ष और साहस को पाठकों के सामने रखा। महाश्वेता ने अपने लेखन में समाज की कठोर सच्चाई को छूने की हिम्मत दिखाई और कभी किसी संवेदनशील मुद्दे से पीछे नहीं हटीं।

शुरूआत में महाश्वेता कविताएं लिखती थीं, लेकिन बाद में कहानी और उपन्यास उनकी प्रमुख विधा बन गए। उनका पहला उपन्यास ‘नाती’ 1957 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘मातृछवि’, ‘अग्निगर्भ’, ‘जंगल के दावेदार’, ‘1084वें की मां’ और ‘माहेश्वर’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की। उनके लगभग 20 लघुकथा संग्रह और करीब 100 उपन्यास प्रकाशित हुए, जिनमें अधिकांश बंगाली भाषा में थे। उनकी कहानियां आदिवासी और दलित समुदायों के संघर्ष, न्याय और जीवन की कठिनाइयों को प्रमुखता से दर्शाती हैं।

महाश्वेता देवी की रचनाओं पर आधारित फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता और साहित्यिक पहुंच को और बढ़ाया। ‘रुदाली’ और ‘1084वें की मां’ जैसी फिल्मों ने उनकी कहानियों को बड़ी स्क्रीन पर जीवंत किया और आम जनता तक उनके संदेश को पहुंचाया। सिर्फ लेखन तक सीमित न रहते हुए, महाश्वेता ने आदिवासी और दलित अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से काम किया। पश्चिम बंगाल और झारखंड में रहकर उन्होंने आदिवासियों की समस्याओं को समझा और उनकी आवाज उठाई।

महाश्वेता देवी को उनके साहित्यिक और सामाजिक योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इनमें साहित्य अकादमी (1979), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1996), रेमन मैग्सेसे (1997) और पद्म विभूषण (2006) शामिल हैं।

महाश्वेता देवी के लिए साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाने का भी शक्तिशाली माध्यम था। उनकी कहानियों में न केवल आदिवासी और दलितों के संघर्ष की झलक है, बल्कि समाज में चल रही असमानता और अन्याय का आईना भी है।

28 जुलाई 2016 को महाश्वेता देवी का निधन हो गया, लेकिन उनकी लेखनी और सामाजिक कार्य आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं।

–आईएएनएस

पीआईएम/एबीएम


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