जे एक्यूज! एक लेख जिसने फ्रांस की आत्मा को झकझोर दिया था


नई दिल्ली, 12 जनवरी (आईएएनएस)। 13 जनवरी 1898 को फ्रांस के राजनीतिक और बौद्धिक इतिहास में एक ऐसा क्षण दर्ज हुआ, जिसने न्याय, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परिभाषा बदल दी। इसी दिन फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक और विचारक एमील जोला ने पेरिस से प्रकाशित होने वाले अखबार एल’ अरोर में अपना ऐतिहासिक खुला पत्र “जे’एक्यूज…!” प्रकाशित किया। यह लेख केवल एक अखबारी टिप्पणी नहीं था, बल्कि सत्ता, सेना और न्यायपालिका के विरुद्ध सीधा आरोपपत्र था।

यह पत्र कुख्यात ड्रेफस प्रकरण से जुड़ा था। अल्फ्रेड ड्रेफस, फ्रांसीसी सेना में एक यहूदी अधिकारी, पर 1894 में जर्मनी के लिए जासूसी करने का आरोप लगाया गया। सबूत बेहद कमजोर थे, फिर भी सैन्य अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सज़ा देकर फ्रेंच गयाना के डेविल्स आइलैंड भेज दिया गया। बाद में यह स्पष्ट होने लगा कि सबूतों में हेरफेर हुई थी और असली दोषी कोई और था, लेकिन सेना और सरकार ने अपनी गलती स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इस पूरे मामले में फ्रांसीसी समाज के भीतर गहराई से मौजूद यहूदी-विरोधी सोच भी उजागर हुई।

एमील जोला ने “जे’एक्यूज…!” में सीधे-सीधे फ्रांसीसी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों, न्यायाधीशों और सरकार पर झूठ, साजिश और अन्याय का आरोप लगाया। उन्होंने एक-एक नाम लेकर बताया कि कैसे जानबूझकर सबूत छिपाए गए और एक निर्दोष व्यक्ति को बलि का बकरा बनाया गया। यह लेख असाधारण साहस का उदाहरण था, क्योंकि उस समय सेना की आलोचना को देशद्रोह के समान माना जाता था।

जोला के इस पत्र के प्रकाशित होते ही फ्रांस दो खेमों में बंट गया। एक तरफ वे लोग थे जो सेना और राष्ट्र की प्रतिष्ठा के नाम पर ड्रेफस को दोषी मानते रहे, दूसरी तरफ़ वे बुद्धिजीवी, पत्रकार और आम नागरिक थे जो न्याय और सच के पक्ष में खड़े हुए। ज़ोला पर मानहानि का मुकदमा चला, उन्हें दोषी ठहराया गया और देश छोड़कर इंग्लैंड जाना पड़ा। लेकिन उनका लेख दबाया नहीं जा सका।

“जे’एक्यूज…!” ने अंततः जनमत को इतना प्रभावित किया कि ड्रेफस मामले की दोबारा जांच हुई। वर्षों बाद अल्फ्रेड ड्रेफस को निर्दोष घोषित किया गया और उन्हें सम्मान के साथ सेना में पुनः बहाल किया गया। यह घटना साबित करती है कि एक लेखक की कलम भी सत्ता के सबसे मजबूत ढाँचों को चुनौती दे सकती है।

आज “जे’एक्यूज…!” को केवल फ्रांसीसी इतिहास की घटना नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और न्याय के संघर्ष का प्रतीक माना जाता है।

–आईएएनएस

केआर/


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