अगले पांच वर्षों में रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच सकता है वैश्विक तापमान: रिपोर्ट

नई दिल्ली, 28 मई (आईएएनएस)। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) और ब्रिटेन के मौसम विभाग (मेट ऑफिस) की ओर से जारी एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगले पांच वर्षों के दौरान वैश्विक औसत तापमान रिकॉर्ड स्तर पर या उसके करीब बना रह सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आर्कटिक क्षेत्र में तापमान वृद्धि वैश्विक औसत की तुलना में अधिक रहने की संभावना है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 से 2030 के बीच वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक काल (1850-1900) के औसत स्तर से 1.3 डिग्री सेल्सियस से 1.9 डिग्री सेल्सियस तक अधिक रह सकता है। हालांकि, अगले पांच वर्षों का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने की संभावना है, लेकिन इसे पेरिस समझौते के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाएगा, क्योंकि यह समझौता लगभग 20 वर्षों की दीर्घकालिक तापमान वृद्धि को आधार मानता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 से 2030 के बीच किसी एक वर्ष के 2024 को पीछे छोड़ते हुए अब तक का सबसे गर्म वर्ष बनने की संभावना 86 प्रतिशत है।
इसके अलावा, 91 प्रतिशत संभावना है कि इस अवधि के दौरान कम से कम एक वर्ष ऐसा होगा, जब वैश्विक औसत सतही तापमान अस्थायी रूप से पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाएगा।
गौरतलब है कि वर्ष 2024 में भी वैश्विक औसत सतही तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया था।
रिपोर्ट के प्रमुख लेखक डॉ. लियोन हरमैनसन ने कहा, “2026 के अंत तक अल नीनो की स्थिति बनने का अनुमान है, जिससे 2027 के रिकॉर्ड तोड़ गर्म वर्ष बनने की संभावना बढ़ जाती है।”
रिपोर्ट के अनुसार, मध्य उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में अगले पांच वर्षों के तापमान पूर्वानुमान अल नीनो जैसी परिस्थितियों की ओर संकेत करते हैं, विशेष रूप से 2027 और 2028 में।
पेरिस समझौते के तहत देशों ने यह लक्ष्य तय किया है कि वैश्विक औसत सतही तापमान में वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखा जाए और इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास किए जाएं।
वैज्ञानिक समुदाय लगातार चेतावनी देता रहा है कि यदि तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होती है, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और चरम मौसम की घटनाएं अधिक गंभीर हो सकती हैं। साथ ही, इससे जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन की संभावनाएं भी कम हो जाएंगी।
–आईएएनएस
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