म्यांमार में सैन्य शासन के तहत चुनाव ‘न तो स्वतंत्र, न निष्पक्ष’, नतीजे पहले से तय: रिपोर्ट


लंदन, 6 जनवरी (आईएएनएस)। म्यांमार में सैन्य जुंटा की देखरेख में कराए जा रहे मौजूदा चुनावों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पश्चिमी राजनयिकों और विश्लेषकों ने इन चुनावों को एक “पैंटोमाइम” यानी केवल दिखावटी प्रक्रिया बताया है, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधता हासिल करना है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 28 दिसंबर से 25 जनवरी तक तीन चरणों में हो रहे ये चुनाव देश में किसी वास्तविक बदलाव की संभावना नहीं दिखाते।

यूके के प्रतिष्ठित अखबार द टेलीग्राफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीजिंग का मानना है कि उसके पड़ोस में एक अस्थिर और आपराधिक राज्य अस्वीकार्य है, लेकिन म्यांमार में हो रहे मौजूदा चुनाव न तो स्वतंत्र हैं और न ही निष्पक्ष।

रिपोर्ट के अनुसार, मतदान केंद्रों के बाहर हथियारबंद पुलिस की तैनाती है और लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करने वाला उत्साही संगीत वीडियो लगातार चल रहा है, लेकिन देश के प्रमुख शहर यांगून में मतदान को लेकर लोगों में खास उत्साह नहीं दिख रहा।

यह 2020 के बाद म्यांमार का पहला चुनाव है। उस समय भारी मतदान के चलते लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची की पार्टी को ऐतिहासिक जीत मिली थी। इसके विपरीत, मौजूदा चुनावों में यांगून और मांडले में मतदान बेहद कम बताया गया है।

द टेलीग्राफ से बात करते हुए एक 32 वर्षीय महिला ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “मैं वोट नहीं देना चाहती, लेकिन वोट न देने से डर लगता है। अगर मैंने वोट दिया तो ऐसा लगेगा जैसे मैं अपने ही विश्वासों से धोखा कर रही हूं। और अगर वोट नहीं दिया तो डर है कि मेरा नाम दर्ज हो जाएगा और बाद में पूछताछ हो सकती है। हर फैसला खतरनाक लगता है।”

रिपोर्ट में बताया गया है कि सैन्य तख्तापलट को अब लगभग पांच साल हो चुके हैं, जिसने सू ची की लोकप्रिय सरकार को अपदस्थ कर दिया था। इसके बाद से देश में भीषण संघर्ष, आर्थिक तबाही और गहरे सामाजिक संकट ने म्यांमार को झकझोर दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने के बजाय, जुंटा का पूरा जोर लोगों को किसी तरह मतदान के लिए मजबूर करने पर है, न कि देश की गंभीर समस्याओं के समाधान पर।

संयुक्त राष्ट्र की पूर्व विशेष दूत यांगही ली ने कहा, “यह सैन्य शासन द्वारा दशकों से रचे जा रहे फर्जी चुनावों की श्रृंखला का सबसे खराब उदाहरण है। इनका उद्देश्य लोकतांत्रिक स्थान को दोबारा खोलना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वह कभी खुले ही नहीं।”

उन्होंने चेतावनी दी कि ये चुनाव “न तो स्वतंत्र हैं और न ही निष्पक्ष” और इनके नतीजे पहले से तय हैं।

–आईएएनएस

डीएससी


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