सबके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सुलभ होना चाहिए: मोहन भागवत


लखनऊ, 18 फरवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य मूलभूत आवश्यकताएं हैं। ये व्यवसाय नहीं हो सकते। शिक्षा और स्वास्थ्य सबके लिए सुलभ होने चाहिए।

मोहन भागवत ने बुधवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में आयोजित शोधार्थी संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि पश्चिम के लोगों ने शिक्षा के साथ खिलवाड़ किया। उन्होंने हमारी शिक्षा व्यवस्था हटाकर अपनी थोपी, जिससे उन्हें काम करने के लिए काले अंग्रेज मिल जाएं। अंग्रेजों ने जो बिगाड़ा, उसको ठीक करना होगा।

उन्होंने कहा कि संघ का कार्य देश को परम वैभव संपन्न बनाना है। संघ समाज की एकता और गुणवत्ता की चिंता करता है। संघ को समझना है तो संघ के अंदर आकर कर देखिये। संघ को पढ़कर नहीं समझा जा सकता है। संघ को संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करने का काम करना है। संघ किसी के विरोध में नहीं है। संघ को लोकप्रियता, प्रभाव और शक्ति नहीं चाहिए।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत की दिशा और दशा बदलने में शोध की बड़ी भूमिका है। सत्यपरक बातें सामने आनी चाहिए। हम अज्ञानता से भारत को समझ ही नहीं पाएंगे। उन्होंने शोधार्थियों से कहा कि जो भी शोध करें उसे उत्कृष्ट रूप से, प्रामाणिकतापूर्वक, तन-मन-धन से, निःस्वार्थ भाव से देश के लिए करें। उन्होंने कहा कि संघ को लेकर बहुत दुष्प्रचार होता है। शोधार्थियों को सत्य सामने लाना चाहिए।

उन्होंने वैश्वीकरण पर बात करते हुए कहा कि यह कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। आज वैश्वीकरण का मतलब बाजारीकरण से है, जो खतरनाक है। हम वसुधैव कुटुंबकम की बात करते हैं, यानी पूरे विश्व को अपना परिवार मानते हैं। जब तक सब सुखी नहीं होंगे, एक व्यक्ति सुखी नहीं हो सकता है, इसलिए हमारा जीवन संयमित होना चाहिए, उपभोगवादी नहीं होना चाहिए। संयम और त्याग का जीवन हमारी संस्कृति के आत्मबोध में है। पश्चिमी देशों ने जड़वाद फैलाया। उन देशों की सोच है कि बलशाली बनकर खुद जियो और बाकी को छोड़ दो। जो बाधक बने, उन्हें मिटा दो। यही काम आज अमेरिका और चीन कर रहे हैं, लेकिन आज दुनिया भर की समस्याओं के प्रश्नों का उत्तर भारत के पास है। विश्व गुरु बनना है तो सभी क्षेत्रों में शक्तिशाली बनना होगा। दुनिया तभी मानती है जब सत्य के पीछे शक्ति हो।

उन्होंने कहा कि धर्म का शाश्वत स्वरूप सदैव प्रासंगिक है। सृष्टि जिन नियमों से चलती है, वह धर्म है। धूल का एक भी कण धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता है। धर्म सबको सुख पहुंचाता है। हमारी सभी बातों में धर्म लागू है। आचरण धर्म, देश और काल के अनुसार बदलता रहता है। धर्म बताता है कि हमें अकेले नहीं, सबके साथ जीना है।

संघ प्रमुख ने कहा कि पर्यावरण के प्रति हम लोगों को मित्र भाव से जीवन को जीना चाहिए। पेड़ लगाना, पानी बचाना, और एकल प्लास्टिक का प्रयोग न करना जैसे कार्य पर्यावरण संरक्षण में सहायक हो सकते हैं। हमें आधुनिक तकनीक का भी पर्यावरण संरक्षण में उपयोग करना चाहिए।

–आईएएनएस

विकेटी/डीकेपी


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