बांग्लादेश में पत्रकारों पर शिकंजा, यूनुस सरकार पर आतंकवाद कानून के दुरुपयोग का आरोप


ढाका, 22 जनवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर देशभर में पत्रकारों को निशाना बनाने के लिए आतंकवाद-रोधी कानूनों के इस्तेमाल का गंभीर आरोप लगा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने पत्रकारों की गिरफ्तारी की अनुमति देकर अब तक का अपना सबसे “शर्मनाक कदम” उठाया है, जिसके चलते कई पत्रकार महीनों से बिना ट्रायल के हिरासत में हैं और उन पर हत्या जैसे “असाधारण” व “अतार्किक” आरोप लगाए गए हैं।

नई दिल्ली स्थित स्वतंत्र थिंक टैंक राइट्स एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप के हवाले से कहा गया है कि दिसंबर 2025 तक यूनुस सरकार ने आपराधिक मुकदमों, वित्तीय जांच और शारीरिक हिंसा के जरिए कुल 640 पत्रकारों को निशाना बनाया।

द डिप्लोमैट की रिपोर्ट के अनुसार, ढाका के पत्रकार अनीस आलमगीर को 14 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था। वे सरकार की नीतियों की सोशल मीडिया पर आलोचना करने के आरोप में आतंकवाद-रोधी कानून के तहत मुकदमे का सामना कर रहे हैं और अब भी हिरासत में हैं। इसी तरह पत्रकार मोंजुरुल आलम पन्ना पर 28 अगस्त को एक संवैधानिक कानून चर्चा में भाग लेने के कारण समान आरोप लगाए गए, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत संरक्षित माना जाता है।

इन आरोपों के बावजूद, यूनुस के प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने दावा किया कि सरकार की आलोचना करने के कारण “एक भी पत्रकार पर मुकदमा नहीं चलाया गया है” और पत्रकार “कुछ भी लिखने के लिए स्वतंत्र” हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह मामला “कानूनी हथियारकरण” का उदाहरण है, जिसमें सरकारें कानूनों का सहारा लेकर पत्रकारिता को अपराध की श्रेणी में लाती हैं। यह तरीका सीधे सेंसरशिप से अलग होता है, क्योंकि यह अदालतों, विधायिकाओं और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के जरिए लागू किया जाता है, यानी उन्हीं संस्थानों के माध्यम से जो प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश का आतंकवाद-रोधी कानून बिना न्यायिक वारंट के अनिश्चितकालीन हिरासत, 24 दिनों तक की कस्टोडियल पूछताछ और आजीवन कारावास तक की सजा की अनुमति देता है। इसके अलावा, आतंकवाद की परिभाषा इतनी व्यापक है कि “जनता में भय या असुरक्षा पैदा करने” या “सरकारी कामकाज को अस्थिर करने” वाले किसी भी कृत्य को इसमें शामिल किया जा सकता है।

स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि कई पत्रकार खुलकर बोलने से बच रहे हैं। ढाका के एक न्यूज़रूम प्रमुख ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे सरकार की आलोचना करने से “डरे और असुरक्षित” महसूस करते हैं और कई पत्रकार “सिर्फ जीवित रहने के लिए आत्म-सेंसरशिप” अपना रहे हैं।

दिसंबर में हालात और बिगड़ गए, जब भीड़ ने द डेली स्टार और प्रथम आलो अखबारों के दफ्तरों पर हमला कर उन्हें आग के हवाले कर दिया। हमलावरों ने इन अखबारों को भारत और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना समर्थक बताते हुए निशाना बनाया।

–आईएएनएस

डीएससी


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