सिविल सेवकों के पास नहीं होना चाहिए चीनी सरकार का कोई भी पहचान पत्र : ताइवान
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ताइपे, 28 फरवरी (आईएएनएस)। ताइवान के नए नियम के तहत देश के सिविल सेवकों को ‘चीन में निवास न होने’ की शपथ लेनी होगी। उन्हें ही राष्ट्रीय पहचान, आवासीय प्रमाण पत्र या पासपोर्ट सहित कोई भी चीनी पहचान पत्र न रखने की शपथ भी लेनी होगी।
ताइपे टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ताइवान के मुख्यभूमि मामलों की परिषद (एमएसी) के अनुसार, यदि सैन्य कर्मियों, सिविल सेवकों और शिक्षकों के पास चीन सरकार की ओर से जारी कोई भी दस्तावेज पाया गया तो उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया जाएगा।
यह फैसला ताइवान के सिविल सेवा मंत्रालय की ओर से पिछले सप्ताह स्थानीय सरकारों को नोटिस जारी करने के बाद लिया गया। नोटिस में सिविल सेवकों से चीनी निवास या चीनी पहचान पत्र न रखने की शपथ पर हस्ताक्षर करने की अपील की गई थी।
इससे पहले, एमएसी ने मंत्रालयों और अन्य संबंधित एजेंसियों को यह जांच शुरू करने के लिए कहा था कि क्या सिविल सेवकों, शिक्षकों या सैन्य कर्मियों के पास ऐसे दस्तावेज हैं?
एमएसी के मुताबिक चीनी दस्तावेजों का होना न सिर्फ ताइवान की सुरक्षा के लिए खतरा है बल्कि राष्ट्र के प्रति उनकी वफादारी पर भी सवाल उठाता है।
अखबार ने बताया कि दोषी पाए जाने पर अधिकारियों को सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा और उनकी ताइवान की नागरिकता छीन ली जाएगी।
पिछले हफ्ते राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों ने कहा कि एक दस्तावेज जारी किया जाएगा जिसमें स्वयंसेवकों को सेना में शामिल होने की अनुमति देने से पहले यह शपथ लेने के लिए कहा जाएगा कि उनके पास किसी अन्य देश की नागरिकता नहीं है।
स्थानीय मीडिया के अनुसार, ताइवान की नौसेना में सेवारत यांग उपनाम वाले एक नाविक के पास हाल ही में एक चीनी पहचान पत्र पाया गया।
ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने शुक्रवार को ताइपे में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि चीन ताइवान की संप्रभुता और लोकतंत्र के लिए एक बड़ा सुरक्षा खतरा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चीन अपने गुर्गों के साथ ताइवान के समाज और लोगों को विभाजित करने के लिए अपने प्रभाव का और अधिक इस्तेमाल कर रहा है।
चीन का आक्रामक रवैया ताइवान के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। ताइपे का आरोप है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी देश में खुफिया जानकारी जुटाने और सार्वजनिक निर्णयों को प्रभावित करने के लिए अपनी ‘संयुक्त मोर्चा’ रणनीति का उपयोग करती है।
चीन ताइवान को अपनी मुख्य भूमि का हिस्सा मानता है और एक अलग प्रांत के रूप में देखता है जिसे अंतत: देश का हिस्सा बनना है। इस मकसद को पाने के लिए बीजिंग शक्ति के इस्तेमाल की संभावना से इनकार नहीं करता है।
–आईएएनएस
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