उत्तर प्रदेश: लखनऊ के 300 साल पुराने अल्पज्ञात सिद्धनाथ धाम का विकास, अंतिम चरण में सौंदर्यीकरण


लखनऊ, 23 मार्च (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश सरकार धार्मिक आस्था से जुड़े स्थलों के विकास के साथ-साथ अल्पज्ञात पौराणिक धरोहरों को पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा राजधानी के सदर क्षेत्र स्थित राज्य संरक्षित स्मारक बड़ा शिवाला श्री सिद्धनाथ मंदिर का कायाकल्प किया जा रहा है, जो अब अंतिम चरण में है।

करीब एक करोड़ रुपए से अधिक लागत वाली इस परियोजना का लगभग 75 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। लखौरी ईंटों, सुर्खी और चूने से निर्मित यह मंदिर अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है। अष्टभुजाकार मंडप पर स्थित इस मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान बाबा सिद्धनाथ श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र हैं। यहां यात्री हॉल और यात्री निवास का निर्माण पूरा कर लिया गया है, जहां श्रद्धालुओं के ठहरने और धार्मिक आयोजनों की सुविधा उपलब्ध होगी।

इसके अलावा, मंदिर तक पहुंचने वाले मार्ग पर इंटरलॉकिंग कार्य किया गया है, जिससे आवागमन सुगम हुआ है। पुरुषों एवं महिलाओं के लिए अलग-अलग शौचालयों का निर्माण भी लगभग समाप्ति की ओर है।

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा, “मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार आस्था से अर्थव्यवस्था के मॉडल पर अल्पज्ञात पौराणिक स्थलों को विकसित कर उन्हें पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि ऐसे स्थलों का विकास न केवल श्रद्धालुओं की आस्था को सशक्त करता है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, छोटे व्यवसायों को बढ़ावा और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का भी माध्यम बनता है।“

मंत्री ने कहा, “बड़ा शिवाला श्री सिद्धनाथ मंदिर का विकास ‘आस्था से अर्थ’ की इसी सोच का हिस्सा है। कार्य पूर्ण होने के बाद यह स्थल श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनेगा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।”

मंदिर परिसर के समग्र सौंदर्यीकरण के तहत आकर्षक लाइटिंग व्यवस्था स्थापित की जा रही है, जिससे रात्रि के समय मंदिर की भव्यता और अधिक निखरेगी। परिसर में हरित क्षेत्र विकसित करते हुए पौधरोपण और लैंडस्केपिंग का कार्य किया जाएगा। श्रद्धालुओं के बैठने के लिए बेंच, साफ-सफाई के लिए बेहतर प्रबंधन, पेयजल व्यवस्था तथा सूचना पट्ट (साइन बोर्ड) भी लगाए जा रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, परिसर को व्यवस्थित एवं सुगठित रूप देने के लिए सौंदर्यपरक दीवारों और प्रवेश द्वार का भी निर्माण कराया जा रहा है। मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह पावन स्थल भगवान श्रीराम के काल से जुड़ा हुआ माना जाता है और कहा जाता है कि वनवास के दौरान लक्ष्मण जी ने यहां आकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना की थी। इसी कारण यह स्थान प्राचीन काल से ही श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।

मंदिर में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग को अत्यंत चमत्कारी माना जाता है और दूर-दूर से भक्त यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यदि कोई श्रद्धालु पूरे श्रद्धा और नियम के साथ लगातार 40 दिनों तक यहां जल अर्पित करता है, तो उसकी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। यही कारण है कि वर्षभर यहां भक्तों की आवाजाही बनी रहती है और विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिलती है।

महाशिवरात्रि और सावन के पवित्र महीने में मंदिर परिसर में भव्य धार्मिक आयोजनों, पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और मेलों का आयोजन किया जाता है। इन अवसरों पर लखनऊ सहित आसपास के जिलों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो उठता है। मंदिर की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता इसे न केवल आस्था का केंद्र बनाती है, बल्कि इसे क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक धरोहर के रूप में भी स्थापित करती है।

–आईएएनएस

विकेटी/एएसएच


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