बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों के बीच भारतीय छात्रों में भय का माहौल


ढाका, 14 जनवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में भारतीय छात्रों, खासकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा की घटनाओं के बीच डर का माहौल गहराता जा रहा है। एक रिपोर्ट में बुधवार को कहा गया कि विदेशी छात्रों के खिलाफ हिंसा के मामलों में बांग्लादेश को केवल खोखले आश्वासन देने के बजाय ‘शून्य सहनशीलता’ की नीति अपनानी चाहिए और दोषियों के खिलाफ विश्वसनीय व सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, विश्वविद्यालयों से अपील की गई है कि वे केवल कर्फ्यू लगाने तक सीमित न रहें, बल्कि कैंपस के बाहर भी अपने छात्रों के साथ मजबूती से खड़े हों।

‘यूरेशिया रिव्यू’ में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है, “किसी देश की नैतिक साख गिरने के कई तरीके होते हैं। उनमें सबसे खामोश, लेकिन सबसे घातक तरीका तब होता है, जब छात्र केवल अपने पासपोर्ट के कारण हॉस्टल से बाहर निकलने में डर महसूस करने लगें। बांग्लादेश आज खतरनाक रूप से उसी रेखा के करीब पहुंचता दिख रहा है।”

रिपोर्ट में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान को दिए गए साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जिसमें ढाका में पढ़ रहे एक भारतीय मेडिकल छात्र ‘करीम’ (काल्पनिक नाम) ने अपनी आपबीती बताई। करीम ने कहा कि वह हर शाम डर के कारण अपने हॉस्टल के कमरे में खुद को बंद कर लेता है- न परीक्षा के दबाव से और न ही थकान से, बल्कि असुरक्षा की भावना के चलते।

रिपोर्ट के अनुसार, “वह दरवाजा खोलने से पहले आवाजें सुनता है, बाजारों में जाने से बचता है और अपना लहजा छिपाता है। उसके पिता की जीवनभर की कमाई से हासिल की गई शिक्षा अब हर दिन सतर्कता का अभ्यास बन चुकी है। जो जगह कभी उसका दूसरा घर थी, वही अब उसके शब्दों में एक जेल जैसी लगती है।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह कोई अकेला मामला नहीं है। वर्तमान में बांग्लादेश में 9,000 से अधिक भारतीय मेडिकल छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश छात्र रोमांच के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी के चलते वहां पढ़ने जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, “भारत में हर साल 20 लाख से अधिक छात्र मेडिकल प्रवेश के लिए आवेदन करते हैं, जबकि सरकारी कॉलेजों में सीटें 60,000 से भी कम हैं। निजी मेडिकल कॉलेज मौजूद हैं, लेकिन उनकी फीस कई परिवारों के लिए अत्यधिक बोझिल है। इसके मुकाबले बांग्लादेश में मेडिकल शिक्षा की लागत लगभग आधी है। हजारों मध्यमवर्गीय भारतीय परिवारों के लिए यह विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी है।”

–आईएएनएस

डीएससी


Show More
Back to top button