पाकिस्तान में आर्थिक संकट के बीच देश का गैस सेक्टर बर्बादी की कगार पर पहुंचा


नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। मीडिया में छपे एक आर्टिकल के मुताबिक, पाकिस्तान के गैस सेक्टर में स्ट्रक्चरल गिरावट आई है। इससे इंडस्ट्रियल कॉम्पिटिटिवनेस को नुकसान हो रहा है और एक्सप्लोरेशन निवेश में कमी आ रही है। इसके साथ ही एलएनजी पर निर्भरता बढ़ रही है और पाकिस्तान की लॉन्ग-टर्म एनर्जी सिक्योरिटी कमजोर हो रही है।

कराची के बिजनेस रिकॉर्डर के आर्टिकल के अनुसार, नीति बनाने वाले गैस संकट को सप्लाई की कमी की समस्या मान रहे हैं, लेकिन असली समस्या इससे कहीं ज्यादा गहरी है। लेख के मुताबिक, अब गैस बाजार की मौजूदा संरचना ही प्रभावी तरीके से काम नहीं कर रही है।

पाकिस्तान अब देसी गैस प्रोडक्शन में कमी, महंगे आरएलएनजी इंपोर्ट, घटते औद्योगिक प्रवाह क्षमता और पूरी ऊर्जा सप्लाई चेन में गंभीर वित्तीय तनाव का सामना कर रहा है। फिर भी संस्थागत स्ट्रक्चर में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। सबसे खतरनाक नतीजा प्रवाह क्षमता में कमी है।

इंडस्ट्रियल कंज्यूमर पाइपलाइन गैस पर अपनी निर्भरता लगातार कम कर रहे हैं क्योंकि टैरिफ अब किफायती नहीं रहे और उनका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। बिजनेस सोलर, कोयला, बायोमास, फर्नेस ऑयल और सेल्फ-जेनरेशन की तरफ जा रहे हैं क्योंकि पाइपलाइन गैस को अब कमर्शियली भरोसेमंद नहीं माना जाता है।

आर्टिकल में कहा गया है कि गलत नीति की वजह से डिमांड में यह कमी और तेज हुई है।

कैप्टिव पावर प्लांट पर गलत तरीके से कैलकुलेट की गई और बिना वजह की उगाही ने कई इंडस्ट्रियल यूजर्स को गैस सिस्टम से बाहर कर दिया। औद्योगिक प्रवाह क्षमता और एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस बनाए रखने के बजाय, नीति ने उद्योग को गैस की खपत से दूर करने के लिए तेजी से काम किया।

नतीजा अंदाजा लगाया जा सकता था: इंडस्ट्रियल कंज्यूमर्स ने ऑफ-टेक कम कर दिया, फ्यूल बदल लिए या पूरी तरह से दूसरे फ्यूल में निवेश कर दिया। आर्टिकल में कहा गया है कि इससे पाइपलाइन सिस्टम की अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान हुआ है।

पाकिस्तान के गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत ज्यादा फिक्स्ड कॉस्ट लगती है। पाइपलाइन, कंप्रेसर स्टेशन, मेंटेनेंस, डेट सर्विसिंग और स्टाफिंग कॉस्ट सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो जातीं क्योंकि नेटवर्क से कम मॉलिक्यूल्स गुजरते हैं। इसके बजाय, ये कॉस्ट कम से कम गैस वॉल्यूम पर फैल जाती हैं।

इसका नतीजा एक पारंपरिक ‘यूटिलिटी डेथ स्पाइरल’ के रूप में सामने आ रहा है। कम खपत की वजह से टैरिफ बढ़ते हैं, बढ़े हुए टैरिफ मांग को और घटा देते हैं, और घटती मांग फिर टैरिफ को और ऊपर ले जाती है।

यूटिलिटी डेथ स्पाइरल, एक ऐसी आर्थिक और संरचनात्मक स्थिति है, जहां पारंपरिक ऊर्जा या उपयोगिता प्रदाता घाटे और कीमतों में वृद्धि के एक दुष्चक्र में फंस जाते हैं।

असल समस्या यह है कि पूरे सिस्टम की तय लागत अब लगातार सिकुड़ते और आर्थिक दबाव झेल रहे उपभोक्ता आधार से वसूली जा रही है।

जैसे-जैसे गैस की खपत कम हो रही है, सुई कंपनियां इंफ्रास्ट्रक्चर लागत, यूएफजी नुकसान, फाइनेंसिंग कॉस्ट, आरएलएनजी दायित्वों और पुराने घाटों की भरपाई उसी घटते उपभोक्ता आधार से करने की कोशिश जारी रखे हुए हैं।

कंज्यूमर्स को तेजी से ऐसी अजीब स्थिति का सामना करना पड़ रहा है जहां सर्विस की क्वालिटी कमजोर हो जाती है, औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता बिगड़ जाती है और सप्लाई का भरोसा पक्का नहीं रहता, फिर भी टैरिफ बढ़ते रहते हैं।

इंडस्ट्री से इम्पोर्टेड एलएनजी को घरेलू क्षेत्र की ओर मोड़ने से संकट और बढ़ गया है। पाकिस्तान ने शुरू में एलएनजी का इम्पोर्ट मुख्य रूप से औद्योगिक विकास, बेहतर बिजली बनाने और आर्थिक बढ़ोतरी में मदद के लिए किया था। इसके बजाय, अब ज्यादा से ज्यादा मात्रा में इसे कम पैसे वाले और भारी सब्सिडी वाले घरेलू उपयोग की ओर मोड़ा जा रहा है। आर्टिकल में कहा गया है कि इसके वित्तीय नतीजे बहुत बड़े हैं।

–आईएएनएस

केके/डीएससी


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