अमेरिका ने अपनी रक्षा रणनीति में चीन और इंडो-पैसिफिक को पहली प्राथमिकता दी

वाशिंगटन, 25 जनवरी (आईएएनएस)। अमेरिका ने चीन और इंडो-पैसिफिक को लेकर एक अहम कदम उठाया है। चीन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा योजना के केंद्र में रखा गया है। रक्षा विभाग की ओर से जारी 2026 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में यह भी चेतावनी दी गई है कि इस क्षेत्र पर नियंत्रण से वैश्विक आर्थिक शक्ति तय होगी और यह सीधे तौर पर अमेरिका की सुरक्षा, स्वतंत्रता व समृद्धि को आकार देगा।
रणनीति में कहा गया है कि हिंद-प्रशांत जल्द ही वैश्विक अर्थव्यवस्था के आधे से अधिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेगा, जिससे इस क्षेत्र तक अमेरिका की पहुंच एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित बन जाएगी। इसमें चेतावनी दी गई है कि अगर चीन या दूसरी शक्ति इस क्षेत्र पर हावी होती है तो वह दुनिया के आर्थिक केंद्र तक अमेरिकियों की पहुंच को प्रभावी रूप से वीटो करने की क्षमता हासिल कर लेगी, जिसके अमेरिका की आर्थिक मजबूती और औद्योगिक पुनरुत्थान पर लंबे समय तक असर पड़ेंगे।
रक्षा विभाग की डिफेंस स्ट्रैटेजी में चीन को दुनिया का दूसरा सबसे शक्तिशाली देश बताते हुए उसकी सैन्य वृद्धि की गति, पैमाने और गुणवत्ता का जिक्र किया गया है। खासकर उन फोर्स पर जिन्हें पश्चिमी प्रशांत और उससे आगे के ऑपरेशन्स के लिए तैयार किया गया है।
चीन की आंतरिक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अमेरिकी रक्षा रणनीति में कहा गया है कि बीजिंग ने यह दिखाया है कि वह अपनी सेना पर और अधिक खर्च कर सकता है और उसे प्रभावी ढंग से कर सकता है।
26 पन्नों की इस अघोषित रणनीति में यह भी कहा गया है कि वाशिंगटन का मकसद टकराव या शासन परिवर्तन नहीं है, बल्कि किसी एक शक्ति को क्षेत्र पर हावी होने से रोकना है। इसमें कहा गया है, “हमारा लक्ष्य सरल है: चीन सहित किसी को भी हम पर या हमारे सहयोगियों पर हावी होने से रोकना।”
इसके साथ ही, डिफेंस स्ट्रैटेजी में स्पष्ट किया गया है कि अमेरिका ‘चीन पर हावी’ नहीं होना चाहता, न ही उन्हें दबाना या अपमानित करना चाहता है।
पेंटागन का कहना है कि वह ‘डिटरेंस बाय डिनायल’ की रणनीति अपनाएगा, जिसका मकसद यह पक्का करना है कि हमला शुरू होने से पहले ही नाकाम हो जाए। इस दृष्टिकोण के तहत अमेरिका ‘फर्स्ट आइलैंड चेन के साथ एक मजबूत बचाव प्रणाली’ बनाएगा और क्षेत्रीय सहयोगियों व पार्टनर्स से सामूहिक रक्षा में ज्यादा योगदान देने का आग्रह करेगा।
रणनीति में इस बात का भी जिक्र है कि इंडो-पैसिफिक में अमेरिकी सैन्य तैनाती का उद्देश्य कूटनीति का समर्थन करना है, न कि उसे कमजोर करना। दस्तावेज में कहा गया है, “एक सम्मानजनक शांति संभव है, जो अमेरिकियों के लिए फायदेमंद शर्तों पर हो, लेकिन जिसे चीन भी स्वीकार कर सके।” इसमें इसे बीजिंग के साथ संबंधों को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नजरिए का आधार बताया गया है।
रक्षा विभाग ने कहा है कि वह रणनीतिक स्थिरता, टकराव से बचाव और तनाव कम करने के लिए पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के साथ मिलिट्री-टू-मिलिट्री कम्युनिकेशन बढ़ाने की कोशिश करेगा। इन प्रयासों के साथ अमेरिकी शक्ति का स्पष्ट प्रदर्शन भी किया जाएगा, ताकि अमेरिकी नेता मजबूत स्थिति से बातचीत कर सकें।
रक्षा विभाग की रणनीति में हिंद-प्रशांत को सीधे घरेलू समृद्धि से जोड़ा गया है और तर्क दिया गया है कि अमेरिका का औद्योगिकीकरण इस क्षेत्र के बाजारों और समुद्री मार्गों तक सुरक्षित पहुंच पर निर्भर करता है। हालांकि दस्तावेज में स्पष्ट है कि अमेरिकी सेना ‘दुनिया में कहीं भी लक्ष्यों के खिलाफ विनाशकारी हमले और ऑपरेशन’ करने की क्षमता बनाए रखेगी, जिसमें सीधे अमेरिकी धरती भी शामिल है, ताकि प्रतिरोध की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।
रणनीति में कहा गया है कि अन्य खतरे बने रहने के बावजूद मातृभूमि की रक्षा और चीन को रोकना वे प्रमुख मिशन हैं जो सैन्य तैनाती और निवेश के निर्णयों को आकार दे रहे हैं।
–आईएएनएस
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