हर्डल को देश में जैवलिन जैसी लोकप्रियता दिलाना चाहता हूं: तेजस शिर्से


नई दिल्ली, 21 जुलाई (आईएएनएस)। 23 साल के तेजस शिर्से 110-मीटर हर्डल्स (बाधा दौड़) में राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारक हैं। उनका अगला लक्ष्य कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में देश के लिए पदक जीतना है। उन्होंने कहा कि वह देश में हर्डल को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं।

ग्लासगो में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले आईएएनएस से खास बातचीत में तेजस शिर्से ने कहा, “जीतना ही एकमात्र लक्ष्य है। मैं वहां जाकर यह नहीं कहना चाहता कि यह प्रक्रिया का हिस्सा है। प्रक्रिया मेरे लिए है। दुनिया के लिए जीत ही मायने रखती है। मुझे बस जीत की परवाह है। दुनिया भी जीत की ही परवाह करेगी। मैं दुनिया में सबसे अच्छा बनना चाहता हूं। मैं जिस भी इवेंट में हिस्सा लूं, उसमें सबसे अच्छा बनना चाहता हूं। अगर मेरी सोच ऐसी नहीं होगी, तो मैं कभी ऐसा नहीं कर पाऊंगा। मैं बस कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियाई खेलों में जाकर जीतना चाहता हूं—यही एकमात्र लक्ष्य है।”

कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में जगह बनाना तेजस शिर्से के लिए आसान नहीं रहा है। पिछले साल हर्डल के दौरान एक टक्कर के कारण उनके टखने में कई जगह चोट लग गई। उस वजह से उनका टखना तीन-चार जगहों से लगभग टूट गया था। उसके बाद, तेजस बहुत उदास हो गए थे।

उन्होंने कहा, “सब कुछ सही करने के बावजूद, और बिना कुछ गलत किए भी, मेरे साथ ऐसा हो गया। मेरी रिकवरी रिलायंस फाउंडेशन की स्पोर्ट्स साइंस टीम की देखरेख में एक बेहतरीन सामूहिक प्रयास में हुई। इस टीम में कोच जेम्स हिलियर, फिजियोथेरेपिस्ट नीलेश मकवाना और स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच क्षितिज भोइते शामिल थे। शुरुआत में उनका लक्ष्य मुझे बिना दर्द के दौड़ाना था। कॉमनवेल्थ गेम्स एक अव्यावहारिक लक्ष्य लग रहा था, लेकिन मैंने कोशिश करने का फैसला किया।”

शिर्से ने कहा, “मैंने अप्रैल के बीच में ट्रेनिंग शुरू की और क्वालीफिकेशन मई के आखिर और जून की शुरुआत में होना था। इतने कम समय में क्वालीफाई करना और समय कम करना व्यावहारिक नहीं था। मेरे मन में यह बात थी कि अगर ऐसा हो जाता है, तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। इसलिए, मैंने खुद को प्रेरित रखने के लिए इसे मिशन चमत्कार का नाम दिया और ऐसा हुआ भी।”

शिर्से ने रांची में फेडरेशन कप में 13.67 सेकेंड और 13.50 सेकेंड का समय दर्ज किया। उन्होंने बताया कि इस प्रदर्शन के बाद मैंने अपनी सोच पर गहराई से काम किया। मैंने खुद से कहा कि अगर मैं यहां से हार भी जाता हूं, तो इससे नीचे नहीं गिर सकता। क्यों न खुद को अपने स्तर पर और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का मौका दिया जाए? मैंने बस यही सोचा कि यह एक ‘फ्री हिट’ जैसा मौका है।

शिर्से ने लुधियाना में फिनिश लाइन पार की, तो ट्रैक के किनारे लगी घड़ी पर समय 13.27 सेकंड दिखा – जो 13.39 सेकंड के जरूरी मानक से बेहतर था।

उन्होंने कहा, “जब आप अच्छा प्रदर्शन नहीं करते, तो आपको लगता है कि सब खत्म हो गया, लेकिन अगर आप बहुत अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो लगता है कि अब मैं सबसे श्रेष्ठ हूं। मैं बहुत उतार-चढ़ाव से गुजरा हूं। उस रेस के बाद मैं खुश था। लेकिन दो-तीन घंटे बाद, मैं फिर उसी हालत में था। इसलिए, जीतने या हारने पर मैं न तो बहुत खुश होता हूं और न ही बहुत दुखी, और मुझे लगता है कि इससे मुझे अपने खेल में बेहतर परफॉर्म करने में मदद मिल रही है।”

पोडियम तक पहुंचने की शिर्से की चाहत उनकी साधारण पृष्ठभूमि से जुड़ी है। छत्रपति संभाजीनगर में बड़े होने के दौरान, वहां सुविधाओं की कमी थी, इसलिए उन्हें इंटरनेट ट्यूटोरियल्स के जरिए खेल सीखना पड़ा।

उन्होंने कहा, “मैं जब ट्रेनिंग करता था, तो हम लकड़ी के हर्डल्स (बाधाएं) बनाते थे। हमारे पास आधुनिक हर्डल्स नहीं थे। असल में यह जिंदगी को भी दर्शाता है। कुछ रुकावटें होती हैं जिन्हें आपको पार करना होता है और फिर आप बस आगे बढ़ते रहते हैं। बड़े होने के दौरान, मुझे कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा – आर्थिक दिक्कतें, घर और परिवार की परेशानियां आदि। मैं कहूंगा कि हर्डल्स ने मुझे चुना है, मैंने उसे नहीं चुना।”

हालांकि भारतीय एथलेटिक्स में हमेशा से फ्लैट स्प्रिंट और जैवलिन थ्रो जैसे फील्ड इवेंट्स ही ज्यादा चर्चा में रहे हैं, लेकिन शिर्से का मानना ​​है कि 110 मीटर हर्डल्स की तकनीकी बारीकियों को देखते हुए देश में इसके लिए एक सांस्कृतिक बदलाव का सही समय आ गया है। आम तौर पर लोग सोचते हैं कि 100 मीटर की दौड़ सबसे तेज और दिलचस्प इवेंट है। लेकिन 110 मीटर हर्डल्स (बाधा दौड़) भी बहुत तकनीकी और दिलचस्प इवेंट है। अगर आप देखें, तो पहले लोग जैवलिन थ्रो के बारे में जानते भी नहीं थे। लेकिन जब से नीरज चोपड़ा ने ओलंपिक गोल्ड जीता, तब लोगों को पता चला कि जैवलिन थ्रो नाम का भी कोई खेल होता है।

उन्होंने कहा, “1983 में विश्व कप जीतने से पहले भारत में क्रिकेट उतना मशहूर नहीं था। मुझे लगता है कि भारत में हमें पूजने के लिए हीरोज की जरूरत होती है। हमें ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जिसे देखकर हम सोच सकें कि उसने यह कर दिखाया है और हम उसे फॉलो कर सकें क्योंकि वह हमारे बीच से ही निकला है। इसलिए ऐसी स्थिति में हमें बहुत गर्व महसूस होता है।”

उन्होंने विस्तार से बताया, “मुझे लगता है कि जब तक कोई बाहर जाकर अच्छा प्रदर्शन नहीं करता और भारत या अपने देश और लोगों के लिए अपना सब कुछ नहीं झोंक देता, तब तक लोग सच में उससे प्यार नहीं करते। मुझे लगता है कि वे जल्द ही देखेंगे कि कोई अपने देश का दुनिया के मंच पर प्रतिनिधित्व करने के लिए कितनी कड़ी मेहनत कर रहा है।”

शिर्षे ने कहा कि मेरा लक्ष्य है कि मैं भी हर्डल्स में कुछ ऐसा कर सकूं कि भारत में इस दिलचस्प खेल को पहचाना जाए। मैं इस खेल की किसी दूसरे खेल से तुलना नहीं करना चाहता, लेकिन यह खेल भी रोमांचक है।

कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में पोडियम तक पहुंचने का सपना पूरा करने के लिए, शिर्से को हीट से लेकर फाइनल रेस तक जबरदस्त ग्लोबल कॉम्पिटिशन का सामना करना होगा। कॉमनवेल्थ लाइनअप में जमैका और कैरिबियन के बेहतरीन हर्डलर्स (बाधा दौड़ने वाले) शामिल हैं, खासकर डेमारियो प्रिंस, जबकि जापान और चीन जैसे एशियाई देश भी कड़ी चुनौती पेश करते हैं।

वर्ल्ड-क्लास प्रतिद्वंद्वियों से घबराने के बजाय, शिर्से माहौल को संभालने के लिए एक आसान रणनीति अपनाते हैं। उन्होंने कहा, “मेरे लिए मुख्य चुनौती खुद पर ज्यादा ध्यान देना होगा। जब मैं ट्रैक पर जाता हूं, तो मैं बाहरी चीजों से ध्यान हटा लेता हूं—दूसरा क्या कर रहा है, इस पर ध्यान नहीं देता, बस खुद पर फोकस करता हूं। मैं जितना ज्यादा खुद पर फोकस करूंगा, उतना ही कम दबाव महसूस करूंगा। दबाव एक अच्छी चीज है—मेरा मानना ​​है कि ‘जब दबाव को सही प्रक्रिया के साथ मिलाया जाए, तो वह अच्छा होता है।’ यहां बहुत सारे अच्छे एथलीट हैं। मुझे लगता है कि पदक जीतने के ज्यादा मौके हैं।”

शिर्षे ने कहा, “ज्योति याराजी, गुरिंदरवीर सिंह और अनिमेष कुजूर जैसे टॉप स्प्रिंटर्स के साथ ‘हाई-परफॉर्मेंस बबल’ में रोजाना ट्रेनिंग करने से उनकी प्रतियोगी क्षमता बनी रहती है।”

उन्होंने कहा कि आपको जीत के बारे में सोचना होगा। फिर जो भी नतीजा हो, वह आपके हाथ में नहीं है। आपको जाकर जीत हासिल करने की कोशिश करनी होगी। भले ही आप न जीतें। आपको अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन और सबसे अच्छा प्रदर्शन करने की कोशिश करनी होगी, और फिर यह सोचना होगा कि कोई और आपसे तेज नहीं दौड़ता। आपको सबसे तेज दौड़ना है और जीतना है। यही एक चीज है जिस पर आपका नियंत्रण है। मुझे कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स के रोमांचक होने की उम्मीद है। मैं यहां बहुत कुछ सीखूंगा। मेरा लक्ष्य पदक जीतना है।

–आईएएनएस

पीएके


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