पाकिस्तान में न्याय व्यवस्था पर बढ़ा सुरक्षा तंत्र का प्रभाव: रिपोर्ट

इस्लामाबाद, 12 जुलाई (आईएएनएस)। पाकिस्तान की न्यायपालिका को जानबूझकर ऐसा बना दिया गया है कि वह न्याय देने वाली स्वतंत्र संस्था के बजाय सुरक्षा तंत्र का एक हथियार बन गई है। ऐसा एक लेख में कहा गया है, जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन की ताजा रिपोर्ट का हवाला दिया गया है।
देशभर में करीब 24 लाख मामले लंबित हैं। इसी वजह से वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट के रूल ऑफ लॉ इंडेक्स में पाकिस्तान 143 देशों में आपराधिक न्याय के मामले में 101वें और दीवानी न्याय के मामले में 129वें स्थान पर है।
वन वर्ल्ड आउटलुक के लेख में कहा गया है, “इतने बड़े स्तर पर मामलों का लंबित रहना सिर्फ व्यवस्था की कमजोरी नहीं है, बल्कि यह ऐसा संसाधन बन गया है जिसका इस्तेमाल मनचाहे तरीके से किया जा सकता है। सुनवाई की तारीख पैसे देकर जल्दी भी मिल सकती है और टल भी सकती है। फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (एफआईआर) भी पैसे लेकर जल्दी दर्ज किया जा सकता है या जानबूझकर रोका जा सकता है। इसी तरह सबूतों में भी चुपचाप बदलाव किया जा सकता है।”
लेख में कहा गया है कि यह सिर्फ न्याय व्यवस्था की नाकामी नहीं है, बल्कि न्याय अब ऐसी चीज बन गया है जो पैसे वालों को मिल जाता है, जबकि जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनके लिए यह लगभग पहुंच से बाहर है।
लेख में कहा गया कि समस्या सिर्फ व्यवस्था की खराबी तक सीमित नहीं है। इसमें पाकिस्तान में हुए ऐसे संवैधानिक बदलावों का भी ज़िक्र किया गया है, जिन्होंने न्यायपालिका की बची-खुची स्वतंत्रता भी कमजोर कर दी है।
लेख में इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (एफआईडीएच) की रिपोर्ट ‘अंडर द बेंच: मैपिंग करप्शन रिस्क्स इन पाकिस्तान्स जस्टिस सिस्टम’ का हवाला देते हुए कहा गया, “2024 और 2025 में पारित 26वें और 27वें संवैधानिक संशोधनों के तहत सांसदों को जजों की नियुक्ति करने वाली समिति में शामिल किया गया। साथ ही, एक न्यायिक परिषद को यह अधिकार दिया गया कि वह ‘अक्षमता’ जैसे अस्पष्ट आधार पर जजों को हटा सके। इसके अलावा एक नया संघीय संवैधानिक न्यायालय बनाया गया, जिसके प्रमुख के चयन पर प्रभावी रूप से प्रधानमंत्री (शहबाज शरीफ) का नियंत्रण माना जाता है।”
रिपोर्ट में कुछ ऐसे निष्कर्ष भी बताए गए हैं जो दिखाते हैं कि यह व्यवस्था किस तरह कमजोर और बेबस लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है।
लेख में कहा गया, “ईशनिंदा के मामलों में, सिर्फ 2024 में ही लगभग 800 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें ज्यादातर गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों के लोग थे। ऐसे मामलों में दोषी ठहराए जाने की दर करीब 95 प्रतिशत है। इसकी एक वजह यह बताई गई कि जज कट्टरपंथी दबाव का सामना करने से बचते हैं और सबूतों में मौजूद विरोधाभासों को चुनौती देने के लिए जरूरी पैसे या पहुंच अधिकांश आरोपियों के पास नहीं होती।”
लेख में कहा गया कि जिन संस्थाओं को भ्रष्टाचार रोकने और व्यवस्था की निगरानी के लिए बनाया गया था, जैसे नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (एनएबी), फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफआईए) और सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल, वे भी चर्चा का विषय बनीं।
लेख के अनुसार, “जो लोग इस व्यवस्था को करीब से जानते हैं, उनका कहना है कि भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाएं जैसे नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो, फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल, सुरक्षा कवच के बजाय चुनिंदा लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के औजार बन गई हैं। आरोप है कि इनका इस्तेमाल सेना की आलोचना करने वालों के खिलाफ किया जाता है, जबकि बाकी मामलों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। वहीं, जो पत्रकार और व्हिसलब्लोअर इन बातों को उजागर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें भी मानहानि के कानूनों और उसी साइबर अपराध कानून के तहत कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है, जिसका इस्तेमाल मजारी के खिलाफ भी किया गया था।”
–आईएएनएस
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