महरंग बलोच को उम्रकैद पर उठा विवाद, रिपोर्ट में पाकिस्तान की मानवाधिकार स्थिति पर सवाल

क्वेटा, 28 जून (आईएएनएस)। बलोच अधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को सुनाई गई उम्रकैद की सजा पाकिस्तान सरकार और बलोच अधिकार आंदोलन के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाती है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस फैसले से बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर चिंताएं और बढ़ सकती हैं तथा लोगों और सरकार के बीच अविश्वास गहरा सकता है।
22 जून को क्वेटा की एक आतंकवाद निरोधक अदालत (एटीसी) ने बलोच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) की संस्थापक महरंग बलोच और संगठन के नेता सिबगतुल्लाह शाह को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यह मामला जुलाई 2024 में आयोजित बलोच नेशनल गैदरिंग के दौरान फ्रंटियर कॉर्प्स (एफसी) के जवान शब्बीर बलोच की मौत से जुड़ा है।
श्रीलंका गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, एटीसी-1 के न्यायाधीश मोहम्मद अली मुबीन ने फैसला सुनाया। हालांकि, महरंग बलोच, अन्य हिरासत में लिए गए बीवाईसी सदस्य और उनके वकीलों ने सुनवाई का बहिष्कार किया। उनका कहना था कि यह एक ‘गुप्त और निष्पक्षता से रहित मुकदमा’ था।
महरंग बलोच के वकील इसरार जट्टक और बीवाईसी नेताओं के अनुसार, आरोप है कि बलोच नेशनल गैदरिंग के दौरान कुछ प्रतिभागियों द्वारा फेंके गए पत्थरों से घायल होने के बाद शब्बीर बलोच की मौत हुई थी।
12 जून से महरंग बलोच और बीवाईसी के अन्य हिरासत में बंद नेता क्वेटा की हुड्डा जिला जेल में धरना दे रहे थे। उनकी मांग थी कि मुकदमा खुली अदालत में चलाया जाए और उन्हें अपनी पसंद का वकील चुनने का अधिकार दिया जाए। उन्होंने कथित रूप से अनुचित न्यायिक प्रक्रिया का विरोध करते हुए मुकदमे का बहिष्कार किया और सरकार द्वारा नियुक्त वकीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
महरंग बलोच की बहन और अधिवक्ता नादिया बलोच ने अदालत के फैसले को खारिज करते हुए इसे गुप्त अदालत का फैसला बताया। वहीं बीवाईसी ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि यह बलोच समुदाय के प्रति पाकिस्तानी राज्य की कथित शत्रुतापूर्ण नीति का प्रमाण है। संगठन ने कहा कि यह फैसला प्रतिरोध और संघर्ष के एक नए ऐतिहासिक दौर की शुरुआत करेगा।
श्रीलंका गार्जियन की रिपोर्ट में कहा गया है कि महरंग बलोच को दी गई उम्रकैद की सजा बलोच अधिकार आंदोलन के प्रति पाकिस्तान सरकार के रवैये में आई गंभीर गिरावट को दर्शाती है। इससे बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं और राज्य तथा बलोच समुदाय के बीच अविश्वास और गहरा हो सकता है, जिससे लंबे समय से चल रहा संघर्ष और भड़क सकता है।
महरंग बलोच वर्ष 2025 से हिरासत में हैं। उनका सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष उनके निजी अनुभवों से जुड़ा रहा है। उनके पिता अब्दुल गफ्फार लंगोव, जो एक वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता थे, वर्ष 2009 में कथित रूप से लापता कर दिए गए थे। तीन साल बाद उनका शव लसबेला जिले में मिला था।
रिपोर्ट के अनुसार, महरंग के भाई को भी वर्ष 2017 में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने हिरासत में लिया था और करीब तीन महीने तक रखा था। इस दौरान उनके साथ कथित रूप से यातनाएं दी गई थीं। इन घटनाओं ने महरंग को बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने और कथित फर्जी हत्याओं के खिलाफ अभियान शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
महरंग बलोच वर्ष 2024 में ग्वादर में आयोजित बलोच नेशनल गैदरिंग की मुख्य आयोजक और प्रमुख वक्ता थीं। इस सम्मेलन में जबरन गायब किए जाने और बलूचिस्तान के संसाधनों के दोहन जैसे मुद्दे उठाए गए थे।
वर्ष 2025 में क्वेटा में 13 अज्ञात शवों के दफनाए जाने के बाद हुए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया था। प्रदर्शनकारियों का दावा था कि ये शव उन लोगों के हो सकते हैं जो जबरन गायब किए गए थे।
इस बीच, मानवाधिकार रक्षकों की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक एंड्रिया बोलानोस वर्गास ने महरंग बलोच और सिबगतुल्लाह शाह को सुनाई गई उम्रकैद की सजा पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने पाकिस्तान की न्यायपालिका से इन अन्यायपूर्ण दोषसिद्धियों को रद्द करने की अपील की है।
वर्गास ने कहा कि मुकदमे के दौरान निष्पक्ष सुनवाई से वंचित करना, आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरुपयोग, शांतिपूर्ण विरोध को अपराध की श्रेणी में रखना, कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन और एक ही मामले में दोहरी सजा जैसे कई गंभीर मुद्दे सामने आए हैं।
उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि महरंग बलोच और सिबगतुल्लाह शाह को गुप्त सुनवाई में उम्रकैद की सजा दिए जाने को लेकर उन्हें गहरी चिंता है। उन्होंने पाकिस्तान की उच्च न्यायपालिका से इन फैसलों को पलटने का आग्रह किया है।
–आईएएनएस
एएमटी/डीकेपी