जगदीशचंद्र माथुर: हिंदी नाटक और रेडियो युग के वह शिल्पकार, जिन्होंने साहित्य को दी नई पहचान


नई दिल्ली, 13 मई (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने सिर्फ लेखन नहीं किया, बल्कि पूरे एक युग की सोच और अभिव्यक्ति को दिशा दी। ऐसे ही महान साहित्यकार थे जगदीशचंद्र माथुर, जिनका जन्म 16 जुलाई 1917 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था।

जगदीशचंद्र माथुर के बचपन और शिक्षा का बड़ा हिस्सा खुर्जा और फिर प्रयाग (इलाहाबाद) में बीता। प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और वहां का साहित्यिक माहौल उनके भीतर रचनात्मकता का बीज बो गया।

माथुर शुरू से ही मेधावी थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका चयन इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) में हो गया, जो उस समय बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। लेकिन इतनी बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बावजूद उनका मन साहित्य से कभी दूर नहीं हुआ। उन्होंने बिहार सरकार में शिक्षा सचिव, भारत सरकार में आकाशवाणी के महानिदेशक और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव जैसे अहम पदों पर काम किया। बाद में वे हिंदी सलाहकार भी रहे। लेकिन इन सब जिम्मेदारियों के बीच भी उनका लेखन लगातार जारी रहा।

उनका साहित्यिक सफर इलाहाबाद में पढ़ाई के दिनों से ही शुरू हो गया था। उसी समय उन्होंने नाटक और एकांकी लिखने शुरू किए, जो उस दौर की मशहूर पत्रिकाओं ‘चाँद’ और ‘रूपाभ’ में प्रकाशित होने लगे थे। धीरे-धीरे उन्होंने हिंदी नाटक और रंगमंच को एक नई दिशा देना शुरू किया। उनके लेखन में इतिहास, संस्कृति और समाज तीनों का सुंदर मिश्रण दिखाई देता है।

जगदीशचंद्र माथुर ने सिर्फ मनोरंजन के लिए नाटक नहीं लिखे, बल्कि समाज की गहराई को समझने और दिखाने की कोशिश की। उनके नाटकों में ऐतिहासिक विषय भी हैं और सामाजिक समस्याएं भी। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘भोर का तारा’, ‘कोणार्क’, ‘ओ मेरे सपने’, ‘शारदीया’, ‘पहला राजा’, ‘दस तस्वीरें’ और ‘जिन्होंने जीना जाना’ जैसे महत्वपूर्ण नाटक शामिल हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चित नाटक ‘कोणार्क’ माना जाता है, जिसने मंच पर खूब लोकप्रियता हासिल की।

माथुर का योगदान रेडियो और प्रसारण के क्षेत्र में भी रहा। उस समय जब आकाशवाणी अपने शुरुआती दौर में थी, उन्होंने वहां रहकर हिंदी को घर-घर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। वे उन चुनिंदा लोगों में थे जिन्होंने बड़े साहित्यकारों को रेडियो से जोड़ा। सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जैसे दिग्गजों की आवाज और रचनाओं को जनता तक पहुंचाने में उनकी बड़ी भूमिका रही। इसी दौर में उन्होंने हिंदी को एक सांस्कृतिक आंदोलन की तरह आगे बढ़ाया।

टेलीविजन की शुरुआत भी उनके कार्यकाल के समय 1949 में हुई थी, जो भारत में संचार के नए युग की शुरुआत थी। उन्होंने इसे भी साहित्य और संस्कृति से जोड़ने की कोशिश की। जगदीशचंद्र माथुर का निधन 14 मई 1978 को हुआ, लेकिन उनका साहित्य आज भी जीवित है।

–आईएएनएस

पीआईएम/एएस


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