भारतीय संगीत जगत के 'अनमोल रत्न', जिन्होंने छोटी उम्र में हासिल की खयाल, ध्रुपद और टप्पा जैसे रागों में निपुणता


मुंबई, 9 मई (आईएएनएस)। आज जब हम पुरानी यादों और मधुर संगीत की बात करते हैं तो पंकज मलिक का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। वे एक बेहतरीन गायक, दुर्लभ संगीतकार और सौम्य व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी शानदार कलाकारी के सम्मान में आज भी प्रशंसक उन्हें भारतीय संगीत जगत का अनमोल रत्न बताते हैं।

सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि भावनाओं और जीवन दर्शन का सुंदर मिश्रण प्रशंसकों को देने वाले पंकज मलिक का जन्म 10 मई 1905 को कोलकाता में हुआ था। पिता मणि मोहन मलिक और माता मनमोहिनी मलिक संगीत प्रेमी थे।

पंकज मलिक ने बचपन से ही संगीत की ओर रुझान दिखाया। उन्होंने दुर्गादास बंदोपाध्याय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली और कम उम्र में ही खयाल, ध्रुपद और टप्पा जैसे कठिन रागों में निपुणता हासिल कर ली। कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका जीवन संगीत की ओर मुड़ गया। दीनेन्द्रनाथ टैगोर से रवीन्द्र संगीत सीखने के बाद वे रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं को लोकप्रिय बनाने वाले प्रमुख गायकों में शामिल हो गए।

पंकज मलिक आकाशवाणी से भी जुड़े रहे। उन्होंने देवी को समर्पित विशेष कार्यक्रम ‘महिषासुर मर्दिनी’ का काफी लंबे समय तक संचालन किया। मूक फिल्मों से शुरू फिल्मी सफर ने 1930 के दशक में बोलती फिल्मों के आने के बाद से सफलता की सीढ़ी चढ़ना शुरू कर दिया। उन्होंने हिंदी ही नहीं बल्कि बंगाली भाषा में भी 90से ज्यादा फिल्मों में संगीत दिया। उन्होंने गायकी के साथ ही कई फिल्मों में अभिनय भी किया, जिसे दर्शकों का प्यार मिला।

पंकज मलिक की यादगार फिल्मों और गानों पर नजर डालें तो उनकी संगीतबद्ध फिल्म ‘धरती माता’के ‘दुनिया रंग रंगेले बाबा’ गाने आज भी लोगों को आकर्षित करते हैं। 1938 में आई फिल्म ‘बड़ी दीदी’ और 1939 में आई ‘दुश्मन’ में उन्होंने कुंदन लाल सहगल के साथ बेहतरीन काम किया। ‘करूं क्या आस निरास भाई’ गाना भारतीय फिल्म संगीत का एक क्लासिक गीत माना जाता है।

फिल्म ‘कपाल कुण्डला’ में पंकज मलिक ने खुद गाकर ‘पिया मिलन को जाना’ गीत प्रस्तुत किया था। फिल्म ‘नर्तकी’ का मशहूर गाना ‘ये कौन आज आया सवेरे सवेरे’ आज भी रेडियो और विविध भारती पर बजता सुनाई देता है। फिल्म ‘जिंदगी’ में कुंदन लाल सहगल की आवाज में गाया गया गाना ‘मैं क्या जानू क्या जादू है’ लता मंगेशकर को बेहद प्रिय था। फिल्म ‘डॉक्टर’ में पंकज मलिक द्वारा गाया गया ‘चले पवन की चाल’ गाना उस समय बहुत लोकप्रिय हुआ। फिल्म ‘माय सिस्टर’ का ‘दो नैना मतवाले’ और फिल्म ‘यात्री’ के गीत आज भी संगीत प्रेमी बार-बार सुनते हैं।

मलिक उन शुरुआती संगीतकारों में शामिल थे जिन्होंने भारतीय और पश्चिमी संगीत को खूबसूरती से मिलाया। उन्होंने पश्चिमी वाद्यों को अपनी रचनाओं में बहुत कुशलता के साथ इस्तेमाल किया। फिल्मी गीतों के अलावा उन्होंने गैर-फिल्मी गीत भी गाए। राग यमन कल्याण पर आधारित उनका भजन ‘तेरे मंदिर का हूं दीपक’ सुनते ही मन में आस्था और भक्ति का भाव जाग उठता है।

19 फरवरी 1978 को पंकज मलिक इस दुनिया से विदा हो गए। उनके जाने के कई दशक बाद भी उनकी मधुर आवाज और अमर रचनाएं लोगों के दिलों में आज भी जीवित हैं। वर्ष 2006 में भारतीय डाक विभाग ने उनकी जन्मशती के अवसर पर उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया था।

–आईएएनएस

एमटी/वीसी


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