भारत-इजरायल के बीच रिश्तों को नई दिशा देने की जरूरत, सामाजिक स्तर पर साझेदारी मजबूत करने की जरूरत

तेल अवीव/नई दिल्ली, 11 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत और इजरायल को ज्यादा मजबूत, सामान्य और आगे की सोच वाली साझेदारी बनाने के लिए अपना सामाजिक आधार बढ़ाना होगा।
पिछले एक दशक में भारत-इजरायल के बीच संबंध काफी मजबूत हुए हैं, लेकिन अब इन्हें टिकाऊ बनाने की चुनौती है। इसके लिए दोनों देशों को अपने सामाजिक आधार का विस्तार करना चाहिए।
भारत और इजरायल के बीच संबंधों को मजबूत और टिकाऊ बनाने के लिए केवल रणनीतिक स्तर ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी गहराई लाने की जरूरत है। इसके लिए छात्रों, पेशेवरों, कामगारों, कलाकारों, शोधकर्ताओं, पर्यटकों और स्थानीय समुदायों के बीच रोजमर्रा के संवाद और भागीदारी में गंभीर निवेश जरूरी है।
द जेरूशलम पोस्ट में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, भारत-इजरायल संबंध लंबे समय से रक्षा, कृषि, खुफिया, तकनीक और व्यापार जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर केंद्रित रहे हैं। नरेंद्र मोदी की फरवरी 2026 में इजरायल यात्रा ने इस साझेदारी को और मुख्यधारा में ला दिया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि संबंधों के अगले चरण को स्थायी बनाने के लिए इन्हें सिर्फ सरकारी स्तर तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आधिकारिक दौरे और समझौते संबंधों को गति तो देते हैं, लेकिन भरोसा, आपसी समझ और दीर्घकालिक स्वीकृति समाज के भीतर रोजमर्रा के संपर्कों से ही बनती है—जैसे कक्षाओं, कार्यस्थलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और समुदायों में।
रिपोर्ट के अनुसार, आज भी कई भारतीय इजरायल को मुख्य रूप से भू-राजनीति और संघर्ष के नजरिए से देखते हैं, जबकि कई इजरायली भारत को व्यापक सांस्कृतिक या पर्यटन दृष्टिकोण से समझते हैं। इस वजह से रणनीतिक और सामाजिक समझ के बीच एक अंतर बना हुआ है।
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि जनमत ही यह तय करता है कि संकट के समय दोनों समाज कैसे प्रतिक्रिया देंगे और क्या वे संबंधों को सिर्फ लेन-देन के रूप में देखते हैं या एक सार्थक साझेदारी के रूप में।
रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि छोटे-छोटे सामाजिक संपर्क—जैसे छात्र विनिमय, सांस्कृतिक कार्यक्रम, साझा त्योहार या कार्यस्थल की दोस्ती—वास्तव में दोनों देशों के बीच मानवीय जुड़ाव को मजबूत करते हैं, जो कूटनीतिक प्रयासों से हमेशा संभव नहीं होता।
इसका नतीजा यह निकला कि भारत-इजरायल संबंधों का भविष्य सिर्फ रक्षा कॉरिडोर और डिप्लोमैटिक मीटिंग्स में ही नहीं, बल्कि किचन, कैंपस, वर्कप्लेस और डिजिटल स्पेस में भी तय होगा। यहीं पर जान-पहचान बढ़ती है, भरोसा ज्यादा मजबूत होता है, और यहीं पर रणनीतिक साझेदारी इंसानी गहराई हासिल करती है।”
–आईएएनएस
केके/वीसी