पाकिस्तान में हिरासत में ईसाई व्यक्ति की मौत पर अल्पसंख्यक संगठन का विरोध

इस्लामाबाद, 10 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान में एक ईसाई व्यक्ति की पुलिस हिरासत में मौत को लेकर अल्पसंख्यक अधिकार संगठन ने कड़ी निंदा की है। संगठन ने इसे “फर्जी आरोपों” के आधार पर की गई गिरफ्तारी के बाद हुई “कस्टोडियल किलिंग” बताया है।
वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) के अनुसार, 42 वर्षीय इफ्तिखार मसीह, जो चार बच्चों के पिता थे और यूनिवर्सिटी ऑफ लाहौर में माली का काम करते थे, को पुलिस ने कथित अपहरण के मामले में गिरफ्तार किया था। पुलिस का दावा है कि मसीह ने जेल के अंदर आत्महत्या कर ली।
हालांकि, परिवार ने इस दावे को खारिज करते हुए आरोप लगाया कि हिरासत में उन्हें यातनाएं देकर मार डाला गया।
संगठन ने इफ्तिखार के भाई रियासत मसीह के हवाले से बताया कि पंजाब प्रांत के इंडस्ट्रियल एरिया पुलिस स्टेशन के कहना पोस्ट पर तैनात अधिकारी मोहसिन शाह ने मामला “सुलझाने” के लिए 2 लाख पाकिस्तानी रुपये की मांग की थी, जबकि कोई एफआईआर या शिकायत दर्ज नहीं थी।
रियासत मसीह ने कहा, “मेरा भाई बेगुनाह था, उसका चरित्र अटूट था।” परिवार ने किसी तरह रिश्वत की रकम जुटाने की कोशिश की, लेकिन बाद में उन्हें बताया गया कि इफ्तिखार ने कथित तौर पर पंखे से दुपट्टा बांधकर आत्महत्या कर ली।
परिवार का आरोप है कि जब उन्होंने शव देखा तो उस पर चोटों के निशान, घाव और बेरहमी से पिटाई के संकेत थे। उन्होंने आत्महत्या की थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया।
वीओपीएम ने कहा, “न पोस्टमार्टम रिपोर्ट, न न्याय- सिर्फ मामले को दबाने की कोशिश। न कोई सबूत, न कोई शिकायतकर्ता सामने आया। यह एक साजिश थी, जिससे परिवार से पैसे ऐंठे जा सकें।”
इस घटना के बाद गुस्साए करीब 300 ईसाई समुदाय के लोगों ने पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन किया और सड़क जाम कर दी। प्रदर्शनकारियों ने एंबुलेंस तक रोक दी और इफ्तिखार के लिए न्याय की मांग की। इस दौरान प्रांतीय विधायक फाल्बस क्रिस्टोफर भी मौके पर पहुंचे और जवाबदेही की मांग की।
विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस ने आरोपी अधिकारी मोहसिन शाह और उसके एक सहयोगी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, हालांकि संगठन ने सवाल उठाया है कि क्या यह पर्याप्त कार्रवाई है।
वीओपीएम ने कहा कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। संगठन के अनुसार, 2025 के पहले आठ महीनों में पाकिस्तान में पुलिस “एनकाउंटर” में 924 लोगों की मौत हुई है, जो मानवाधिकारों की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
संगठन ने सवाल उठाया कि “कितने और निर्दोष लोगों की जान जाएगी, तब जाकर व्यवस्था जागेगी?”
–आईएएनएस
डीएससी