तरकुलहा देवी को प्रसन्न करने के लिए आज भी चढ़ती है बलि, नवरात्र पर होते हैं विशेष अनुष्ठान और पाठ

नई दिल्ली, 11 मार्च (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश की पावन धरती पर पूर्वांचल की मां विंध्यवासिनी से लेकर पश्चिम में विराजित मां शाकंभरी देवी भक्तों की रक्षा करने के लिए तैनात है और यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में चैत्र नवरात्र के अवसर पर हर मंदिर में भक्तों का तांता लगता है।
प्रदेश की धरती पर ऐसा मंदिर भी स्थापित है, जहां बार-बार अंग्रेजों के सिर काटकर मां को समर्पित किए गए और आज भी वह प्रथा जारी है। हम बार कर रहे हैं मां तरकुलहा देवी की, जिसे मां दुर्गा का उग्र अवतार माना जाता है।
मां तरकुलहा देवी का मंदिर गोरखपुर से 20 किलोमीटर की दूरी पर तथा चौरी-चौरा से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित है, जहां दर्शन करने के लिए सिर्फ देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि नेपाल से भी भक्त मान्यता लेकर आते हैं। माना जाता है कि मां के चरणों में पूर्ण समर्थन देने वाले भक्त के प्राणों की रक्षा खुद मां तरकुलहा करती है और इसके पीछे का कारण मंदिर का इतिहास है।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह जंगलों में पेड़ के नीचे पिंडियों की पूजा करते थे और उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते थे। वह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, और जब भी ब्रिटिश राज में अंग्रेज जंगल और उनकी रियासत में घुसने की कोशिश करते, तो वो उसका गला काटकर मां की पिंडियों को अर्पित कर देते। उन्होंने कई अंग्रेजों के गले काटकर मां को समर्पित किए थे, लेकिन एक दिन अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया है और 6 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की, लेकिन वे विफल रहे।
माना जाता है कि उस वक्त खुद बाबू बंधू सिंह ने मां से प्रार्थना की थी कि अब उन्हें मुक्त करें। कहा जाता है कि तब मां ने उनकी करुण पुकार सुन उनकी इच्छा को पूरा किया और जब उन्हें सातवीं बार फांसी पर लटकाया गया, तब उनके प्राण निकले थे। शहीद बाबू बंधू सिंह की याद में एक स्मारक भी बनाया गया था। उसी दिन से मंदिर में आज तक बलि देने की प्रथा चलती आई है और चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में भक्त मां के सामने बकरे की बलि देते हैं।
चैत्र नवरात्र के मौके पर मंदिर में भक्तों का सैलाब उमड़ता है और कष्टों से मुक्ति पाने और मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त नारियल चढ़ाते हैं। कुछ लोग इच्छा पूर्ति के बाद मां को बलि भी भेंट करते हैं।
–आईएएनएस
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