भारत यूरोपीय संघ के लिए बना एक अहम रणनीतिक साझेदार: रिपोर्ट


नई दिल्ली, 9 मार्च (आईएएनएस)। भारत के जर्मनी और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि वे रणनीतिक साझेदारी के रूप में विकसित हो गए हैं, जिसमें अर्थव्यवस्था, तकनीक और इंडो-पैसिफिक (हिंद प्रशांत) क्षेत्र की स्थिरता जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए हैं।

इंडिया नैरेटिव में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, हाल के वर्षों में जर्मनी, फ्रांस, इटली, फिनलैंड और यूरोपीय संघ के नेताओं के साथ उच्च स्तरीय बैठकों और नए समझौतों ने यूरोप को भारत के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के बाद दूसरा बड़ा रणनीतिक क्षेत्र बना दिया है।

पहले भारत और यूरोप के रिश्ते मुख्य रूप से व्यापार, सहायता और प्रवासी भारतीयों से जुड़े मुद्दों तक सीमित थे, लेकिन अब यह संबंध तकनीकी सप्लाई चेन, रक्षा उत्पादन, स्वच्छ ऊर्जा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संयुक्त सहयोग तक फैल गए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले पांच वर्षों में ब्रसेल्स ने भारत को वैश्विक स्थिरता बनाए रखने वाला महत्वपूर्ण देश और ‘ग्लोबल साउथ’ की मजबूत आवाज के रूप में देखना शुरू किया है। इसका उदाहरण फरवरी 2025 में यूरोपीय आयोग के आयुक्तों के समूह का भारत दौरा है, जो पहली बार हुआ था।

इसके साथ ही यूरोप के कई बड़े देशों ने भारत के साथ द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत किया है। फ्रांस ने भारत के साथ अपने रिश्तों को ‘स्पेशल ग्लोबल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ का दर्जा दिया है। वहीं जर्मनी भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी के 25 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है।

इटली ने 2025 से 2029 के लिए संयुक्त रणनीतिक कार्य योजना जारी की है, जबकि फिनलैंड ने 2026 की शुरुआत में उच्च स्तर की बैठकों के जरिए भारत के साथ अपने संबंध और मजबूत किए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, इससे एक ऐसा ढांचा तैयार हो रहा है जिसमें यूरोपीय संघ के स्तर पर व्यापार, डिजिटल और कनेक्टिविटी सहयोग और सदस्य देशों के स्तर पर रक्षा, उद्योग और तकनीकी सहयोग शामिल हैं। इससे भारत की आर्थिक वृद्धि और सुरक्षा के लक्ष्य को भी मदद मिलती है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जर्मनी और भारत के संबंध पहले से आर्थिक सहयोग पर आधारित थे, लेकिन अब यह साझेदारी रणनीतिक उद्योग और हरित ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में बढ़ रही है।

जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के जनवरी 2026 में भारत दौरे को इस बात का संकेत माना गया कि जर्मनी अब भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक प्रमुख साझेदार के रूप में देखता है, न कि केवल एक उभरते हुए बाजार के रूप में।

भारत के लिए जर्मनी की पूंजी और तकनीक चीन पर निर्भर सप्लाई चेन के जोखिम को कम करने और देश में मैन्युफैक्चरिंग तथा हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने में मदद कर सकती है।

वहीं, जर्मनी के लिए भारत एक बड़ा बाजार है और इससे चीन पर अधिक निर्भरता कम करने का विकल्प भी मिलता है। इसके साथ ही यह जर्मनी को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीति के अनुरूप एक महत्वपूर्ण साझेदार भी प्रदान करता है।

–आईएएनएस

डीबीपी/


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