भारत शिक्षा क्षेत्र में विदेशी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देकर 2040 तक 113 अरब डॉलर बचा सकता है: रिपोर्ट


नई दिल्ली, 26 फरवरी (आईएएनएस)। एक रिपोर्ट में गुरुवार को कहा गया कि भारत विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में मजबूत उपस्थिति बनाने के लिए प्रोत्साहित करके 2040 तक लगभग 113 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा देश में ही बचा सकता है। इसके लिए विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए करीब 1.9 करोड़ वर्ग फुट वर्टिकल कैंपस स्पेस की जरूरत होगी।

डेलॉइट इंडिया और नाइट फ्रैंक इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी विश्वविद्यालयों की मौजूदगी से विदेश में पढ़ाई के लिए जा रही बड़ी राशि को कम किया जा सकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के प्रभाव से भारत एक ‘छात्र भेजने वाले देश’ से ‘वैश्विक ज्ञान केंद्र’ बनने की ओर बढ़ रहा है। वर्तमान में देश में लगभग 5.3 करोड़ छात्र उच्च शिक्षा में नामांकित हैं। सरकार का लक्ष्य 2035 तक सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को 50 प्रतिशत तक पहुंचाना है, जिसके लिए छात्रों की संख्या बढ़कर करीब 7.2 करोड़ हो सकती है।

रिपोर्ट में एक गंभीर विसंगति को उजागर किया गया है कि ‘उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षा संस्थानों में अवसरों की भारी कमी है’।

रिपोर्ट के अनुसार, “2025 में लगभग 54,000 छात्रों ने इंजीनियरिंग के लिए जेईई के सभी स्तर पास किए, लेकिन प्रतिष्ठित आईआईटी केवल 18,000 सीटें ही उपलब्ध करा सके। इससे छात्रों की आकांक्षाओं और उपलब्ध उच्च गुणवत्ता वाले ढांचे के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।”

नाइट फ्रैंक इंडिया के इंटरनेशनल पार्टनर, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक शिशिर बैजल ने कहा कि भारत का शिक्षा क्षेत्र ऐतिहासिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। 18 अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है या उन्होंने संचालन शुरू कर दिया है, जिससे बदलाव की रफ्तार साफ दिखाई दे रही है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे केवल छात्रों की संख्या बढ़ाने के बजाय अपने शैक्षणिक पाठ्यक्रम की गुणवत्ता पर ध्यान दें। खासकर एसटीईएम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डेटा साइंस और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों पर फोकस जरूरी है।

रियल एस्टेट सेवाएं देने वाली कंपनी ने दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और मुंबई को ऐसे शहर बताया है जहां विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए बेहतर संभावनाएं हैं, क्योंकि यहां कॉर्पोरेट ढांचा मजबूत है। वहीं, चंडीगढ़, कोच्चि और जयपुर जैसे टियर-2 शहरों को भी बेहतर प्रशासन और बुनियादी ढांचे के कारण उभरते केंद्र के रूप में चिन्हित किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रतिभा और प्रशासनिक सफलता के लिए मजबूत फैकल्टी पाइपलाइन तैयार करना और ऐसे प्रशासनिक मॉडल विकसित करना जरूरी है जो शैक्षणिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए भारतीय नियमों के अनुरूप हों।

–आईएएनएस

डीबीपी/


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